सोमवार, 17 सितंबर 2007

हे राम !



कितनी स्थितियों में आपके पास व्यक्त करने के लिए ये पूणॆ या अपूणॆ वाक्य होता है। देखते हैं...

१. जब आप या आपका चप्पल गूं से सन जाए
२. आप अपने किसी संगी के किसी कृत्य से अफसोस करने की स्थिति में पहुंच जाएं
३. आपके आसपास की परिस्थितियां आपके वश में न हों
४. जब आप कुछ भी करने की स्थिति में न रहें
५. निजॆन स्थान पर जब आप अकेले हों
६. आश्चयॆ को व्यक्त करने की स्थिति में
७. आप या आपका कोई संबंधी मर रहा हो (जैसे गांधीजी के साथ हुआ)
८. किसी घटना से दुखी होकर
९. यात्रा के दौरान आपकी बस या ट्रेन छूट जाए और आगे साधन मिलने का कोई जुगाड़ न दिख रहा हो
१०. ...ताजा संदभॆ में देखें तो केंद्र सरकार और विपक्षी व वामदलों की शोशेबाजी पर भी इस वाक्य का व्यवहार समुचित है

ये तो कुछ बानगी भर है। इससे इतर भी कई स्थितियां ऐसीं हो सकती हैं जहां राम का नाम बरबस लोगों के कंठ से बाहर आ जाता है. मैथिली के प्रसिद्ध विद्वान हरिमोहन झा कह गए हैं कि राम ने अपने जीवन में कई ऐसे कृत्य किए हैं जिसके कारण उनका नाम गूं से छू जाने पर लोग ले ही लेते हैं. अब झाजी की यदि मानें तो इतने पर भी यदि अब तक राम भगवान के रूप में बचे हुए हैं तो ये उनकी नहीं, हमारी आस्था और भाजपा, विहिप जैसे संगठनों की बदौलत ही है, ऐसा हम मान सकते हैं. फिर यदि केंद्र या कोई भी सरकार राम से जुड़ा कोई भी मसला ऐसे तरीके से उठाएगी जैसे कि उसने उठाया, तो हंगामा लाजिमी ही है. मुश्किल उन वामपंथियों को ज्यादा होनी चाहिए थी क्योंकि उनके माक्सॆ अपने पोथे में राम जैसे किसी तत्व का उल्लेख ही नहीं कर गए हैं. लेकिन उनके बंगाल से सटे बिहार में राम की लुगाई सीता की जन्म स्थली है. उससे सटे नेपाल के जनकपुर को तथाकथित ही सही राम का ससुराल माना जाता है. (यहां ये गौरतलब है कि बिहार के दो जिले (मधुबनी और बेगूसराय) कभी वामपंथियों के लिए लेनिनग्राद और पीट्सबगॆ कहे जाते थे.) तो शायद बिहार के कारण ही वामपंथियों ने बच-बचके राम सेतु पर केंद्र का विरोध किया.
भाजपा अपने पुराने प्लेटफामॆ पर आ गई। उसके लिए स्थिति ज्यादा सही है. वो राम को बाकी दलों के मुकाबले बेहतर जानती-समझती है. उसके कई कारिंदे डायरेक्ट राम मंदिर का संतत्व छोड़ के आए हैं. राम की किसी भी चीज पर उनका पहला अधिकार बनता है. फिर वो सेतु. राम की जिंदगी का टरनिंग प्वाइंट तो वही था. इस पर किसी को कुछ करने का अधिकार है तो वह भाजपा को है, संप्रग को नहीं. इसलिए भाजपा ने ठान ही रखी है कि राम के नाम का गूं अगर किसी के चप्पल में लगेगा तो वह भाजपा का होगा, किसी और का नहीं. बाकियों के लिए क्या लिखें वो तो अपना धमॆ निभा रहे है इंडियन एक्सप्रेस की तरह. केंद्र में कोई भी हो, किसी 'एंगिल' से विरोध करना ही है.
अब आप खुद ही सोच सकते हैं कि ऊपर जो मैंने कुछ परिस्थितियां गिनाईं उनमें से कौन-कौन सी स्थिति इन दलों के लिए फबेगी..................

मंगलवार, 11 सितंबर 2007

अनुभव



कल अपने हषॆ भाई की कार में बैठकर चाय पीने गए। अच्छा लगा. ड्राइवर नया था, हम बैठने वाले भी उन्हीं की तरह के सवार थे. लेकिन इसमें नया क्या है. दरअसल अनुभव नया है. कार में इससे पहले भी बैठे हैं हम लोग. उसमें बैठकर चाय पी है, बातें की हैं, खालें छीली हैं आदि-आदि. लेकिन कल का बैठना थोड़ा सुहाना था.
याद है जब पहली बार कार में बैठे थे। उस फिएट के दरवाजे से पता नहीं क्यों बाहर आ रही ग्रीज ने मेरी शटॆ पर धब्बे छोड़ दिए. अव्वल बैठ तो गए थे संख्या ज्यादा थी इसलिए आराम नहीं था. खैर खिड़की के पास बैठने का मौका हाथ लगा था तो उसके शीशे को ऊपर-नीचे करने का भी. आजकल की कारें तो पावर-विंडो से लैस होती हैं. तब वालियां हस्त-कमॆ पर आश्रित हुआ करती थीं. तो भई, हम पद्मिनी कंपनी की बनाई सत्तर के दशक में खरीदी गई और अभी तक तथाकथित रूप से मेनटेंड फिएट में बैठे थे. यह साल १९९४ चल रहा था. हमने मैट्रिकुलेशन की परीक्षा ही थी. परीक्षा के बाद वैसे भी कुछ नया करने का जी होता है. हम कार की सवारी कर रहे थे. वो भी फिएट की जो राजा-गाड़ी यानी एंबेस्डर की टक्कर में आई थी.
कार चली. गांव की सड़क पर कार चल रही थी. सड़क क्या थी साहब, ईंटों को तिरछे खड़ा कर उसे एकसाथ रख भर दिया था. लोग उस पर चलने लगे थे, सो वह सड़क कहाने लगी थी. हमारी फिएट किसी रानी की तरह उसी सड़क पर दौड़ी चली जा रही थी. अंदर बैठे हम और हमारे भाई-बंधु. हा-हा-हा, ही-ही-ही, हू-हू-हू आदि जैसी हंसने सरीखी आवाज कभी-कभार कार से बाहर आ जाती थी. यह पता उससे लगता था जब बाहर सड़क पर जा रहा साइकिल सवार कार की हानॆ से हड़बड़ा कर कार की ओर देखने लगता था. खैर, कार अपने लक्ष्य से अभी पांच किलोमीटर दूर थी. उसमें बैठे एक भाई को शु-शु हो आई. यह आई तब थी कार बियाबान में चल रही थी. ऐसा नहीं था कि रात थी और किसी भूत-वूत का खतरा था. पर भई कार थी, बियाबान में कैसे रुकती. रुक भी जाती तो दरवाजा कैसे खुलता. दरवाजा खोलने के लिए ड्राइवर को पूरा त्रिपेक्षण करके आना पड़ता. ड्राइवर ही क्यों गेट खोलता, इसका कारण ये था कि सिफॆ वो ही कार में गेट खोलना जानता था. बाकी सब खिड़की के पास बैठकर हवा खाने वालों में से थे. तो भाई साहब का शु-शु. अब भी एक उलझन थी. दरअसल शु-शु बिना जल यानी पानी लिए हो नहीं सकती थी. इसलिए किसी तालाब या पोखर के सामने ही कार रोकी जा सकती थी. गांवों के रास्ते में अमूमन कई तालाब और पोखर होते ही हैं. लेकिन हमारी कार चलते-चलते जिस जगह पर पहुंच गई थी वहां कम से कम साफ पानी से भरा ऐसा कुछ भी नहीं दिख रहा था. अब क्या हो. समस्या मुंह बाए खड़ी थी, बेहतर समाधान पीछे छुट गए थे, कामचलाऊ यहां मिल नहीं रहे थे. खैर, ड्राइवर ने एक ..खत्ता.. (वैसे गड्ढे जहां अस्थाई तौर पर पानी जमा हो जाता है) देखा. भाई साहब ने भी देख लिया था यह उनका चेहरा बता रहा था. कार रुकी. भाई साहब उतरे. हो आए. लेकिन ड्राइवर ने शैतानी की थी. वह भी चला गया था. हमें कार में ही छोड़ गया था. मुसीबत ये थी कि हम में से भी कइयों को शु-शु करनी थी. पर कार का दरवाजा कैसे खुलेगा ये नहीं पता था. हम बैठे ही रह गए. भाई साहब आ गए. कार चल पड़ी. वे चूंकि आराम पा चुके थे. उनके मुंह से काफी राहत भरी बातें निकल रही थीं. बाकी खोए-खोए से दिख रहे थे. कुछ देर तक तो सब उनकी सुनते रहे. लेकिन हद की भी सीमा होती है. एक उबल ही पड़ा. उसके देखे-देखे और धीरे-धीरे भाई साहब की ओर कभी तीखे तो कभी मधुर कटाक्ष बरसने लगे. भाई साहब की समझ में नहीं आ रहा था कि अभी तक लक्ष्मण बने भाइयों को रास्ते में कौन विद्रोही होने का पाठ पढ़ा गया. वे सोच में डूब गए. जब नतीजा कुछ न निकला तो अंततः पूछ ही लिया कि भई क्या हो गया. सब एकाएक से नाराज क्यों हो गए. तब तक हमारी कार अपने लक्ष्य पर पहुंच चुकी थी. ड्राइवर के दोनों कान कुछ देर पहले से ही गेट खोलने संबंधी अनुनय-विनय सरीखी बातें सुन-सुनकर ऊब चुकी थी. उसने झट गेट खोल दिया. हम उतर गए यह जाने बिना कि भाई साहब ने कुछ पूछा था.

शुक्रवार, 7 सितंबर 2007

बैठे ठाले

परदे के पीछे क्या है, यह सवाल जेहन में कुरेदता तो हर किसी को है, पड़ताल कुछ ही लोग करते हैं. सुभाष घई ने जरूर लोगों को एक बार चोली के पीछे दिखाने की कोशिश की. माधुरी दम भर नाची और ईला ने भी खूब गला फाड़ा. लोग नजर जमाए बैठे रहे कि अब दिखेगा, तब दिखेगा कि चोली के पीछे क्या है. मगर पीछे की कौन कहे, वो तो चोली के आजू-बाजू तक दिखाने से महरूम कर गई लोगों को. खैर, जाने दीजिए फिर कोई आएगा जो शायद हिम्मत करे.
दरअसल, परदे के पीछे की असलियत दिखाना माद्दे की बात है। सब में नहीं होता। कुछ लोग अमूमन इसका दम भरते रहते हैं, कुछ करते रहते हैं लेकिन होता-जाता कुछ नहीं। अब वामदलों को ही ले लीजिए। उन्होंने जो परमाणु करार के पीछे की असलियत देख ली होती तो शायद दिखा देते। पर कांग्रेस वालों और खासकर अपने 'मनजी' ने जो २८ सितारों वाला परदा करार के आगे तान रखा है उसके भीतर वाम तो क्या उन सितारों के कभी फरमाबरदार रहे दक्षिण वालों को भी एक झलक नहीं देखने दे रहे हैं। मामला यहीं आकर तन जाता है. वाम वाले 'झलक दिखला जा' की जिद पर अड़े हैं, और मनजी हैं कि, 'जिद ना करो' पर ध्यान धरने की धमकी, सलाह और जो भी कह लें, दिए जा रहे हैं.
वैसे अपने मनजी अच्छे बच्चे हैं. सोनिया ने जब उनसे कहा कि प्रधानमंत्री बन जाओ, तो वे डर गए. गुरशरण जो उनके वित्त मंत्री रहते सरकारी वह भी गैर-नौकरशाही बंगला देख चुकी थी, ने भी कहा, ऐसा भी क्या है जब मैडम कह ही रही है तो प्रधानमंत्री बनने में तुम्हारा क्या जाता है, बन जाओ. मगर मनजी तो ठहरे पाई-पाई को देखने वाले. बीवी को समझाया कि प्रधानमंत्री वह नहीं जो मैं पहले था. जो जी में आया कर दिया. अब तो 'दूसरों' के जी को देखकर सब्जी (आप इसकी जगह बहुराष्ट्रीय उत्पाद का कोई पापुलर नामलेवा चीज को रख सकते हैं) खानी होगी. लेकिन औरों की तरह मनजी की बीवी भी महिला ही है, सो वो कहां मानने वाली थी. और न मानी. थक-हारकर मनजी को प्रधानमंत्री बनना पड़ा. पर अब भी एक डर था सो पहुंच गए मैडम के पास. कहा, वहां जो उस चेयर पर बैठ के मैं कुछ कहूंगा तो इधर-उधर हो गया तो. मैडम समझ गई कि लौंडा नया है. उन्होंने डर दूर करते हुए कहा, बेटा तू जिस सूली को देखकर उस पर चढ़ने से डर रहा है, उससे डर मत. बगलवाली दीवार के पीछे मैं खड़ी हूं. मनजी को राहत मिली कि चलो यहां भी मैं अकेला नहीं रहूंगा. सो वे मान गए.अब तक आपकी समझ में आ ही गया होगा कि परदे का क्या महत्व है और होता है. बाकी कल........ (हच वाला नहीं)

सोमवार, 27 अगस्त 2007

खुश होने के बहाने

बहाने बनाना हमारी फितरत में होता है. मां-बाप के कोप से बचने को शायद ही कोई ऐसा हो जिसने बहाने न बनाए हों. ये आदत बचपने से निकलकर जवानी और कह लें तो ताउम्र बनी रहे, इसकी कोशिश सभी करते हैं. जवानी में बीवी से बहाने बनाए बिना तो संभवतः काम ही नहीं चल सकता. दफ्तर से देर से आने में, चाय पीने के बहाने दोस्तों से मिलने में, दोस्तों से मिलने के लिए दफ्तर बार-बार जाने में और ऐसे कई मुआमले हैं जहां बहाने बेशक मारक तौर पर काम करते हैं।
अभी हाल ही में मेरी बीवी घर गई. कहा ये था कि जल्दी आएगी. मैंने सोचा ''पहली बार बीवी घर जा रही है शायद मुझे रहने, खाने या 'पीने' में दिक्कत होगी. लेकिन दो ही दिनों में महसूस हुआ कि ज्यादा एनेर्जेटिक हो रहा हूँ। काफी दिनों से जो पढ़ाई छूट गयी थी उसे पुनः चालू कर लिया. यहाँ तक कि रोजाना दफ्तर से आकर खाना खाने कि नौबत या दबाव भी थोड़ी कम हो चली. ख़ूब मस्ती की और एक दिन तो जाम भी छल्काए. वो रात में तबियत गड़बड़ा गयी वर्ना पकड़े भी नही जाते. खैर, दो दिनों बाद बीवी का फोन आया. मैं राहत से था, ये कह दिया, वो भी ठीक थी ये जान लिया. मुसीबत तब आयी जब उसने ये पूछा कि 'मैं आ जाऊं'. मैं चाहते हुये भी उसे जवाब देने से हिचक रहा था. वो थी कि चढ़ी ही जा रही थी. मैंने कहा, राखी नजदीक है, भाइयों को कहॉ तड़पता हुआ छोडोगी, 29 के बाद ही आना. मगर बीवी भी निकली चालाक. उसे लग गया कि ये बहानेबाजी कर रहा है. फौरन ताड़ गई. उसके बाद फोन भी नहीं किया और राखी से दस ही दिन पहले आ धमकी. मैं क्या करता. बीवी ही थी घर में रखने का सामाजिक फरमान सालों पहले जारी हो ही चुका है. कुछ न बोला. बाद के दिनों में बीवी को बता ही दिया कि तुम नहीं रहती हो तो मैं सुकून से रहता हूं. वह कलि-युगी है. न रोयी-धोयी और न बाल ही झटके. कहा, मैं भी बहुत मजे में थी. फिर मौका दे रही हूं. राखी मैं दिल्ली में मनाउंगी, पहुंचा आना. सोचिए जरा, बीवी की बात मैं टाल सकता था....

बुधवार, 22 अगस्त 2007

जाहि विधि राखे 'राम...'


पुरानी कहावत है ये. बुजुगॆ गाहे-बगाहे आजमा लिया करते थे. नौजवानों पर अमूमन कम ही असरकारी होता था. है. हां, स्त्रियां जरूर अपवाद रही हैं. उन्हें कहावत से गुरेज तो नहीं होता, अलबत्ता 'रानी झांसी' बनते वक्त वो इससे किनारा कर लिया करती हैं. सिलसिला अनादि काल से चला आ रहा है. मीडिया दफ्तरों में 'राम' की जगह 'दूसरे' नाम ले लिया करते हैं. दिखाऊ माध्यम यानि टीवी में राम की जरूरत संभवतः बड़े मामलों में पड़ती है. रद्दी के लिए ज्यादा उपयुक्त आजकल के अखबारों में हर वरिष्ठ पद पर बैठा शख्स इस 'राम' का 'यूज' कर लिया करता है. कोई खबर ठीक से 'फ्लैश' न हुई तो राम डांटेंगे, तथ्य कम हों तो राम गुस्सा होंगे, ठीक से 'प्रेजेंट' न किया तो राम तुलना करेंगे, और गर छूट गई तब तो समझिए नौकरी जाते-जाते ही बचेगी। अव्वल ये राम न हुए तोप हो गए।
दरअसल, दफ्तरों का माहौल ही ऐसा होता है कि वरिष्ठों के ‌'दिग्दशॆन' को नजरअंदाज करना खतरे से खेलने के माफिक बन जाता है।
एक वे हमारे और हम सबके वरिष्ठ राम से 'दावे' के साथ रोजाना मिलते हैं, मिलते न सही तो बातचीत तो रोजाना हो ही जाती है।
दूसरा, उनके पास 'अ-पार' अनुभव होता है,
तीसरा, वे 'इन-चाजॆ' होते हैं,
चौथा, उनकी रगों में हमसे ज्यादा 'स्वामी-भक्ति' का खून बहता है,
पांचवां, उन तक वो सारी 'चीजें' पहुंचती हैं जिनसे 'आम तबका' महरूम रहता है,
छठा, वे राम की 'इच्छाओं' को भी बखूबी जानते-समझते हैं,
सातवां, उनमें 'विपरीत परिस्थितियों' में भी काम करते रहने और उसका डंका पीटने की अद्भुत क्षमता होती है,
आठवां, वे हमेशा ही गंभीरता का चोला ओढ़े बड़े मिलनसार व्यक्ति होते हैं,
नौवां, उनमें राम-प्रिय होने जैसी खूबियां भी होती हैं,
अंत में दसवां, वे आपके 'जस्ट बॉस' होते हैं।
वरिष्ठों में इससे इतर भी कई खूबियां हो सकती हैं, अलबत्ता होती भी हैं, कही भी जाती हैं। आप मीडियावाले इससे बेहतर कई और खूबियां भी निकाल सकते हैं. स्वतंत्र हैं. इसलिए वरिष्ठों की बात का 'बुरा' नहीं मानना चाहिए. ऐसा लोग कहते हैं. उनकी बात को धेले-भर का भी नहीं मानना चाहिए, ऐसी भी बात नहीं. लेकिन वो कहते हैं न कि 'पगड़ी बची रहे'। इसलिए इतना मत बात-मानू बनिएगा। यह सही है कि राम की विधि से रहने में कोई खतरा नहीं है मगर राम का ही चलते रहने देने से खतरा हो सकता है, अतः थोड़ा संभलकर।

नोट - नौकरी करते रहने और बॉस को पटाकर रखने से यदि राम-कथन का भला होता हो, तो बुराई नहीं, क्यों?

सोमवार, 20 अगस्त 2007

हम क्यों बोलते नहीं...

जीवन में कई ऐसे मौके आते हैं जब हमें बोलना पड़ता है. बोलना शरीर का वैचारिक बोध-प्रदशॆन भी है. पर मामला जब वैचारिक हो तो विचार करना स्वाभाविक है. विचार प्रकट कहां करना है, कहां किया जा सकता है, कैसे किया जाना चाहिए, क्यों किया जाना जरूरी है, इसके क्या प्रभाव पड़ेंगे आदि तथ्यों पर बोलने के पहले सोचा जाना विचार के प्रभाव को निरूपित करता है. हम कई बार अपने वरिष्ठों (तथाकथित ही सही) के सामने सिफॆ इसीलिए वैचारिक रूप से कमतर पड़ जाते हैं कि शायद मेरी बात उन तक सही तरीके से संप्रेषित होगी अथवा नहीं. यह अलग बात है कि वे वरिष्ठ भी सिफॆ इसीलिए हमारी बात को तवज्जो नहीं देना चाहते क्योंकि उन्हें लगता है कि उनकी अरसे से चली आ रही भ्रमात्मक विचारधारा कायम रहे. दुनिया की कई आसान सी समस्याएं इसी कारणवश समाधान के साहिल तक पहुंचने से अब तक वंचित हैं. हां यह जरूर है कि इन समस्याओं के समाधान को ढूंढ़ने की कवायद, निरी भी कहलें, लगातार जारी रहती हैं.
बोलने का इतिहास विश्वभर में और खासकर भारत में समृद्ध है. बतरस की कला हमारी देसज संस्कृति का अभिन्न हिस्सा हुआ करती थी, और है. फिर भी हम बात-चीत में कमजोर पड़ते हैं. क्यों, यह संभवतः कठिन प्रश्न है. और तो और आपके लिए यह सोचना भी मुश्किलात खड़ी कर सकता है कि बातों से जीतना हम जैसों के लिए मुहावरा सरीखा है. इतने पर भी बोलने में हम कमजोर सिद्ध होते हैं, इसकी पड़ताल जरूरी है. करें क्या..., अजी छोड़िए, पड़ताल कर हम क्योंकर अपनी आफत मोल लें. वे वरिष्ठ हैं, वे सोच लेंगे. हा...हा...हा...

सोमवार, 13 अगस्त 2007

इन भक्तों की बलिहारी




सावन की फुहार जीवन में आनंद लाती है। ऐसा कविगण कह गए हैं. अब कह गए तो कह गए. इससे भला कांवड़ियों का क्या. उन्हें तो शिवरस में भीगना है, भीगेंगे. लोगों पर आफत आए तो आए, अपनी बला से.ऐसा मानस शिवभक्त कांवड़ियों के लिए बनना सावन के शुरुआती दिनों के दौरान पश्चिमी उत्तर प्रदेश के इलाकों में हर साल बनता है. सोचिए यदि आपको भी दो घंटे की यात्रा चार घंटे में पूरी करनी पड़े तो, खटारा सी बसों में ऊंघते और मुंह से लार चुआते यात्रियों के साथ सहयात्रा का सुख लेना पड़े, बीच-बीच में अकस्मात ही बम-भोले या हर-हर महादेव का विचित्र तरीके का आलाप सुनना पड़े, या फिर नालियों में बजबजाते कीड़े-मकोड़ों की तरह बस अड्डों पर लोगों को दोने और पत्तलों में जूठनों की तरह पकौड़े खाते देखना पड़े तो जाहिर है इन सबकी जड़ में मौजूद शिवलिंगाभिलाषी कांवड़ियों को आप ...नमन... तो करेंगे ही. हां, ये लिहाज जरूर करेंगे कि सामूहिक तौर पर उन्हें या उनकी दयनीय दशा देखकर थोड़ा रुकेंगे और कुछ बोलेंगे नहीं. कांवड़ियों की दशा दयनीय इसलिए कि एक तो ...बेचारे... जल भरकर इत्ती दूर से उन्हीं के लिए खुली और फैली सड़क पर लाते हैं, तिस पर से पैर में उग आए फफोलों से कराहते रहते हैं. तनिक रुकिए, इस स्थिति में आपके लिए (यदि आप कारटूनिस्ट भी हों तो) कांवड़ियों से उत्पन्न हास्य का बोध करा दूं. होता ये है कि कांवड़िए जाते तो समूह में हैं. यानि गाड़ियों में भरकर. मगर वहां से आते वक्त शिव की भक्ति से इतना उद्वेलित या कह लें उत्प्रेरित हो जाते हैं कि इनकी गाड़ियां इनके पीछे चलती हैं और ये बड़े ...मजे... में आगे-आगे जल उठाए चलते रहते हैं. यहां हास्य बोध उत्पन्न करने के पीछे मेरा तकॆ भले एक कारटूनिस्ट को मैटर उपलब्ध कराना रहा हो, लेकिन जानकारी यह है कि ऐसे कई पढ़े-लिखे कांवड़िए आपको यूं ही मिल जाएंगे. अब ये गुत्थी तो मेरे समझने से बाहर है कि बाबा भोलेनाथ के द्वार तक गाड़ी से चढ़कर जाने में ज्यादा भक्ति होती है या वहां से लौटकर आने में. वैसे गाड़ी से चढ़कर जाने की इच्छा यदि मेरे जैसों से पूछी जाए तो अपने घर यानि वह गांव जहां का मैं दरअसल हूं, वहां जाना ठीक रहता है. इससे एक तो झांकी अच्छी बनती है, दूसरा मां-बाप को भी लगता है कि बेटा अब काम का हो गया है. खैर, ये कांवड़िये अपने फफोलों से कराहते हैं और इनसे आच्छादित पूरा इलाका इनकी भक्ति से. बसें बंद रहती हैं, ट्रेनों में जगह नहीं रहती, जगह-जगह पुलिस बैरिकैडिंग से घिरे इलाके दिखते हैं... रहते हैं तो बस ये कांवड़िए और ये कांवड़िए. हमारे रविनदर भइया का कहना है कि सब प्रशासन की चूतियैय है. ये चाहे तो कभी राजमागॆ (दिल्ली-देहरादून राष्ट्रीय राजमागॆ) बंद न हो.
हम दो-तीन दिन तक जब तक कि कांवड़िया जनित महिमा उनके श्रीमुख से सुनते रहे. जब से होश संभाला है देखते रहे हैं कि घर के बड़े लोग बड़े ही चाव और भक्ति से बाबाधाम जाने के लिए कमर कसा करते थे. ऐसे में बाबा के प्रति भक्ति यहां कम होगी, यह क्यों मान लेते. जो दिक्कत है उसे सहना धमॆ की दृष्टि से जायज समझकर अखबारों में सर धुन लिया करते थे. इसलिए रविनदर भइया के तकॆ से लगता था कि ये भी हमारी ही तरह ...नास्तिक... हो गए हैं इसलिए ऐसी बहकी-बहकी बातें करते हैं. लेकिन भइया कहते हैं न कि मुसीबत अपने सर पड़ती है तभी समझ में आता है. तो हमारी समझ में एक दिन आ गया कि क्यों रविनदर भइया परेशान रहते हैं. उस दिन बसें कम थीं, हम स्टैंड में कान से मोबाइल का फुंतरू सटाए गाना सुन रहे थे, पेपर वाला पेपर बांच रहा था, बेच रहा था, छोले-कुल्चे की दुकानों पर लोग आ-जा रहे, खा-जा रहे थे, स्टैंड का इंचाजॆ चिल्ला-चोट मचाए था, पुलिसवाले एक के बाद एक धड़ाधड़ लोगों का चेकिंग किए जा रहे थे, दूसरे राज्यों की बसें शान से चली जा रही थीं, लेकिन मेरठ जाने वाली बसें भर नहीं आ रही थीं. हमारा मेरठ आना जरूरी था, रविनदर भइया को धमॆसंकट से उबारना था. लेकिन धन्य हो कांवड़ियों की जिनके कारण बसों की सेवा एक तो कम ऊपर से बाधित थीं. हमारी समझ में आ गया कि क्यों रविनदर भइया प्रशासन को कोसते हैं. तुरंत शपथ लिए कि अब हम भी उन्हीं के ग्रुप में रहेंगे और कांवड़ियों को गरियाएंगे. गुस्सा इतना आ रहा था कि पास पड़ी मक्खी को हमने लगभग रौंद ही दिया था, लेकिन वह उड़ गई. हम अफसोस करते रहे. पूरे दो घंटे बाद बस मिली और उसके पांवदान पर सीट. जैसे-तैसे मेरठ आ गए. दिल्ली में जो तरंग उठी थी कि इनके खिलाफ आवाज बुलंद करेंगे, यहां आकर थकान और हिंदू होते हुए ब्राह्मण कुल में जन्म लेने के कारण ज्वार-भाटा बनने से पूवॆ दब गई. दबे-कुचले स्वरूप में अब आप लोगों तक पहुंचेगी. अब आप लोगों को दबे-कुचलों की आवाज उठाने की आदत तो है ही, उठाइएगा. समय तो बीत चुका है. कोई बात नहीं अगले साल......