गुरुवार, 13 मार्च 2008

आइये कुछ फोटो दिखाते हैं आपको

पेट पर पड़ी तो लाल झंडा याद आया। साभार : दैनिक जागरण व पीटीआई



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सपना दिखा रहे हैं माल्या साहब। आइये इस फार्मूला-1 के ट्रैक पर चलने का अभ्यास करें। भारत 21वीं सदी में जा रहा है न। साभार : दैनिक जागरण व एपी


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पहचान रहे हैं इन्हें, ये उसी नाना के नवासे के जाने हैं जिन्होंने जेल में रहकर भारत को खोजा था। ये साहब हेलीकॉप्टर से भारत खोज रहे हैं। साभार : दैनिक जागरण व पीटीआई


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पहले भी किसी ने इनकी व्यथा सुनने की कोशिश नहीं की थी, अबकी देखते हैं किसके कान पर जूं रेंगती है। हम सब पहले भी इनके साथ थे, अब भी हैं। साभार : दैनिक जागरण व पीटीआई

बुधवार, 12 मार्च 2008

तलब



मौके यूं ही नहीं आते. उन्हें लाया भी जाता है. या कहें कि बरबस वो आपके सामने आ जाते हैं. अब यह तय आप पर है कि उसे किस तरह और कैसे भुनाएं. दरअसल इतनी देर तक उंगलियां टिप-टिपाने का मतलब ज्यादा गंभीर नहीं है. यह वस्तुतः मिठाई खाने की इच्छा को जस्टिफाई करने के लिए है.
कुछ दिनों पहले मैं घर पे था. घर मतलब जहां मां-बाप हों या रहते हों, ऐसा मेरा मतलब नहीं है क्योंकि मैं अपने गांव से समझता हूं कि मैं घर पर था. खैर, मैं घर यानी मुजफ्फरपुर में था. जो वहां के हैं उन्हें पता होगा कि उस शहर से सटे एक कस्बा है रून्नी सैदपुर. सीतामढ़ी-मुजफ्फरपुर के रास्ते पर पड़ने वाला यह कस्बाई स्टॉपेज नॉन-स्टॉपेज बसों के लिए नहीं है. हां राज्य परिवहन की सभी बसें जरूर यहां ठहरती हैं. मगर इसकी खासियतों में एक तो जाना-पहचाना सा गांव बेनीपुर का होना है और दूसरा यहां मिलने वाली लजीज मिठाई बालसाही का. (बालुशाही भी पढ़ सकते हैं शुद्धता के लिए). तो पहली पहचान बेनीपुर गांव के बारे में बता दूं कि यह प्रसिद्ध साहित्यकार रामवृक्ष बेनीपुरी का गांव है. और दूसरी बालसाही जो यहां के बस अड्डे से लेकर हर चौराहे पर मिल जाती है. जाहिर है रून्नी सैदपुर से मुजफ्फरपुर की इतनी नजदीकियों के चलते बालसाही ने पहले तो बिहार के इस कहे जाने वाले महानगर को अपना शिकार बनाया और अब पूरे बिहार को करीबन. ऐसा दावा है मेरा.
तो बात जरा यूं थी कि मैं मुजफ्फरपुर में था. मेरठ से मैसेज गया कि बालसाही लेते आना. मैंने भरपूर कोशिश की जैसे कि अन्य लोग करते हैं लेकिन असफल रहा और बैरंग मेरठ लौट आया. जाहिर तौर पर मेरठियों का गुस्से में आना लाजिमी था, वो आए भी. मैं भी नैतिक रूप से उनके साथ था. सो मौका मिला. एक मित्र बनारस गए. मैंने फरमाइश कर डाली वहां से मिठाई लेते आने की. साथ में वहां पढ़ रहे अपने भाई से भी कह दिया कि कुछ मिठाई भेज देना. अब यहां बैठकर उसी की प्रतिक्षा कर रहा हूं. आएगी मिठाई तो खिलाउंगा. तब तक के लिए टाटा-टाटा................

शनिवार, 1 मार्च 2008

हाकी का दिल चुराया


हाकी का दिल चुरा लिया. कुछ अटपटी बात है न. खैर, हम बताते हैं कि बात आखिर है क्या. दरअसल मेरठ में पिछले दिनों एक राष्ट्रीय स्तर के हाकी टूर्नामेंट का समापन हुआ. उसी में बैंड वाले ये गाना बजा रहे थे. बैंड वालों को अक्सर पता होता है कि उन्हें बजाना क्या है. अमूमन लोग-बाग उन्हें बता भी दिया करते हैं कि फलां धुन छेड़ना तो जरा...आदि-आदि. पर मुक्तसर में ये कि बैंड वाले रस्मों की नब्ज जानते हैं, बीमारी दिखी नहीं कि दवा पिला के ही छोड़ेंगे. खैर, बात हो रही थी मेरठ और वहां हुई हॉकी की.

मेरठ से खेलों की पुरानी यारी है. खेल यहां न हों तो पता चले कि इस पट्टी के लोगों के पास गपियाने का एक ऐंगिल ही कम पड़ जाए. तो बात हो रही थी हॉकी टूर्नामेंट में बैंड पार्टी की. बैंड वाले जगह और मूड भांपने के उस्ताद होते हैं. पर बात खेल की हो तो उनका दिमाग कम चलता है. बड़े शहरों (यों मेरठ छोटा शहर नहीं है, पर यहां नहीं) में तो बैंड वालों के पास आप्शन होता है. उनके बैंड वाले दुकान के आजू-बाजू रेडियो मैकेनिकों के वर्कशॉप होते हैं जहां जब तक शटर खुला हो गाने बजते हैं. इससे बैंड वालों को रियाज करने का वक्त मिल जाता है. पर मेरठ जैसे छोटे शहरों में जहां सिर्फ शादी-ब्याह या ऐसे ही किसी त्योहारों पर बैंड वालों को बुलाने का चलन है, वहां इन छाती-फाड़ मनोरंजुओं (नया शब्द लगे तो मनोरंजन करने वाले पढ़िएगा) के जरूरी संसाधन सीमित होते हैं. इसलिए गाने रिपीट होते हैं और लोग बोलते हैं कि चवन्नी छाप बैंड उठा लाया है बबुआ. तो मेरठ में जहां हॉकी स्टिक के सहारे गोलपोस्ट में खड़े गोली को गच्चा दिया जाने वाला खेल खेला जा रहा था वहां इन बैंड वालों की समझ में ही नहीं आ रहा था कि बजाएं तो बजाएं क्या. बड़ी पसोपेश के बाद उन्होंने एक तान छेड़ी, ...दिल चुरा लिया, तूने मुझे प्यार करके, इकरार करके, दिल चुरा लिया.... आसपास के लोग हैरत में उनकी ओर ताकने लगे. बैंड मास्टर समझ गया कि गड़बड़ है. तुरत अमल हुआ, और धुन चेंज. ...आज मेरे यार की शादी है..., लोग हक्का-बक्का. बैंड मास्टर अपनी धुन का और फिल्में देखने का पक्का था. तीसरा दांव लगाया. ...ये देश है वीर जवानों का, अलबेलों का, मस्तानों का, इस देश का यारों...पें,पें,पें.... इतनी देर में लोग भी समझ चुके थे कि बैंड वाले मौजूं धुन की कमी से जूझ रहे हैं. लोगों ने कान फेर लिए, बैंड वालों को राहत मिली, उन्होंने अपनी तुरहियों को विराम दे दिया, हॉकी खिलाड़ी जो अब तक अपने रेफरियों की आवाज और इस बैंड में फर्क नहीं कर पा रहे थे, उन्हें भी लगा कि कुछ है जो छूट रहा है. खैर बैंड बजना बंद हो गया. सभी ने राहत की सांस ली. मगर टूर्नामेंट के आयोजक आम आयोजकों की तरह ही थे सो उन्हें लगा कि हॉकी है, जब खेली भी जा रही है तो बैंड क्यों न बजेगा. लेकिन बैंड वालों की लाचारी से भी वे नावाकिफ नहीं थे सो उन्होंने रिकार्ड चला दिया. मैं क्या लिखूं, आप समझ ही गए होंगे कि आजकल क्रिकेट से लेकर हॉकी या किसी भी खेल में कौन सा 'कबीरा' राग बजाया जाता है, सो बजने लगा. खिलाड़ी भी खुश हो गए थे सो एक टीम ने गोल दाग दी, दर्शक भी खुश हो गए. मैदान पर फील-गुड हो गया.

गुरुवार, 31 जनवरी 2008

माया महा ठगिनी हम जानी

यह हेडिंग आज अच्छी लगी. जनसत्ता में पढ़ी. ऐसा नहीं था कि पहली बार ही पढ़ी थी लेकिन आज के ब्लाग पर लेखन के लिए अच्छी थी. दरअसल बहुत दिनों के बाद एक ब्लाग पढ़ा. याद आ गया कि मैं भी कभी ब्लाग पर लिख लिया करता था. बस बैठ गया. यह भी पता था कि इसे पढ़ेंगे कुछ ही लोग. लेकिन लिखना था सो लिखना था.
इस हेडिंग की बाबत बता दूं यह आलेख आर्थिक विषय से संबंधित था. पर साहित्यिक अंदाज में. सो दे मारा है. हां तो मुद्दे पर आएं. आजकल दफ्तर में और बाहर आने-जाने वालों पर लोगों की नजर टिकती नजर आती है. बात वही पुरानी सी. नया क्या, कौन गया, कितने में गया आदि...आदि.... अमूमन जवाब वही होता है. सब तो गए पर हम तो रह ही गए यार. खैर मालिकों की बेईमानी, कर्मचारियों की वफादारी (दोनों तथाकथित ही कह लें, फर्क नहीं पड़ता) सिस्टम की लाचारी और अनेकानेक बातों से होती हुई परिचर्चा खत्म हो जाती है. कह लें लोग थक गए हैं ऐसी बातों को सुनते हुए. फिर भी लगे पड़े हैं. ऐसे में मुझे यदि ये हेडिंग सूझती है तो क्या गलत है... क्यों

शनिवार, 24 नवंबर 2007

खइबऽ तबऽ न जनबऽ

मरदे बूझला न, खाई-पीए के बात करैत हतियो. तनि ध्यान न द एहि बगल. हम गेल रहली ह ट्रेड फेयर में. उहां बहूते चीज सब बिकाइत रहय. मगर हमरा आ हमर एगो साथी, उहे श्याम सुंदर (न चिन्हलहू कि ?), के लिट्टी-चोखा पर ध्यान रहे. तकइत-तकइत बिहार के पंडाल (पवेलियन) में आखीर घुसिए गेली हम दुनू गोरे. बरा नीमन बनयले हय बिहार के पंडाल के परगति मैदान में. सबे कुछो बिहारे जैसन देखाइत हय.
खैर दोसरा बात सब अभी छोड़ऽ. बिहार के पंडाल में घूस के हम त पहिले तकली आपन मिथिला के. श्याम त मरदे रहल मगही. ऊ हमरा के टोंट कसलक, अरे झाजी इहां बिहाड़ में कहां से मिथिला को ढूंढ़ रहे हैं आप. चलिए घूमते-वूमते हैं. जो जहां दिखेगा देख लेंगे. मगर हो मरदे कथि कहियो, हमरा तऽ ध्यान रहय लिट्टी के. से तकइत-तकइत मिलिए गेल लिट्टी-चोखा के स्टाल. अब जे हमर मन गदगद हो गेल एकरा बारे में जान के कि करबा तू. रहय दा. दुनू गोरे झट्ट दनी स्टाल के दोकानदार के दू पलेट लिट्टी के आडॆर कर दिए. दोकानदारो बरा समझदार रहय. झट दनी दे देलक आ हम दुनू गोरे लग गेली लिट्टी-चोखा के सधावे में. कि कहियो हो मरदे. इह ऐसन महीन सतुआ पीसले रहय कि दुनू गाल के बीच लिट्टिया त गल के हलुआ हो गइल. आ, चटनी, मरदे कि पुछैछा. आलू, टमाटर आ बैगन के तऽ समझ लऽ जे पूड़ा मिसमिसा देले रहलैयऽ. एहि से झूठे न न कहैत हतियो, सचे में मन गदगदा गइल. ओकरा बाद कुछो खाइ के त मन नहिए कयलक मगर हमरा तऽ घूम के फेनू मेरठे आबे के रहय. आ मेरठ में हमर जे बास हथुन न से बड़ा जीहगर हैं. नीमन चीज खाय में जेना मरदे तोरा मन लगैत हौ, ओनाहिते हुनकरो के. से हम आधा किलो गया वला तिलकुटवो ले लिए. ओकरो स्वाद बरा बेजोर हय. सीधे गया पहुंचा देगा जीभ के भीतर जाइते-जाइते. लिट्टी-चोखा खा के हमरा भइल कि तोरो सब के बता दीं ताकि जे सब परगति मैदान में नहि गए हैं ऊ सब जल्दी चले जाएं. कसम से, मज्जा आ जाएगा.
हं ई जान लीजिए कि ई लीखि के हम आईआईटीएफ के परचार नहीं कर रहे हैं, से जान लो बरका बुद्धि लगाने वालों. सच्चे-सच्चे लीखे हैं. एगो बात आउरो जिनकरा के ई लगता हो कि खाली लिट्टिए-चोखा ऊहां मिलता है, गलतफहमी में हैं. अरे दूसरो-दूसरो राज्य के स्टाल हैं. हां सब चीज खाने के बाद पानी 15 रुपए मिलेगा आ बीच में मन करे कि चाह पीना है तो ऊ भी 10 रुपए मिलता है. इसीलिए पानी आ चाह भकोस के जाइएगा.


नोट - अब तक जी में पानी आ गया हो तऽ चल न जाइए, हम बोल न रहे हैं.

रविवार, 18 नवंबर 2007

नागार्जुन के दो रंग

बैठे-बैठे सोच रहा था तब तक नागार्जुन हाथ में आ गए। पेश है उनके दो रंग

यह तुम थीं

कर गयी चाक
तिमिर का सीना
जोत की फांक
यह तुम थीं

सिकुड़ गयी रग-रग
बनाकर ठूंठ छोड़ गया पतझार
उलंग असगुन सा खडा रहा कचनार
अचानक उमगी डालों की संधि में
छरहरी टहनी
पोर-पोर में गसे थे टूसे
यह तुम थीं

झुका रहा डालें फैलाकर
कगार पर खडा कोढी गूलर
ऊपर उठ आयी भादों की तलैया
जुडा गया बौने की छाल का रेशा-रेशा
यह तुम थीं।

१९५७

शासन की बंदूक

कड़ी हो गयी चांपकर कंकालों की हूक
नभ में विपुल विराट-सी शासन की बंदूक

उस हिटलरी गुमान पर सभी रहे हैं थूक
जिसमें कानी हो गयी शासन की बंदूक

बढ़ी बधिरता दसगुनी, बने विनोबा मूक
धन्य-धन्य वह, धन्य वह, शासन की बंदूक

सत्य स्वयं घायल हुआ, गयी अहिंसा चूक
जहाँ-तहां दगने लगी शासन की बंदूक

जली ठूंठ पर बैठकर गयी कोकिला कूक
बाल न बांका कर सकी शासन की बंदूक

१९६६

आगे संभव हुआ तो किताब है ही, और खंगालूँगा यात्रीजी को। अब तक के लिए नमस्ते।

बुधवार, 14 नवंबर 2007

अंतराल के बाद.....

खुश होने के कई कारणों के पीछे, होते हैं कई अंतराल,

बीच की कुछ घटनाएं उन्हें जोड़ती हैं, एक नया अंतराल जनमाने के लिए.

कुछ ऐसा भी घटित होता है जीवन में, कल्पना जिसकी न की हो कभी

सुखद हो या दुखद, ये 'कुछ' भी दे जाता है अंतराल, एक नया अंतराल जनमाने के लिए.

आकांक्षाएं, मनोरथ, भावना, ममत्व, ऐसे शब्द जहन में उभरते हैं जब

समय उन्हें बे-अख्तियार घूरता रहता है, अपनी चुभन से दम निकालने के लिए

ताकि फिर वही अंतराल पैदा हो, एक नया अंतराल जनमाने के लिए.

फिर बांध कर आस डगर पार पहुंचने के लिए, इंसान कोशिश ही तो कर सकता है,

कहां पाट सकता है उस अंतराल को, जो जीवन में उसके दे जाता है अंतराल,

एक नया अंतराल जनमाने के लिए.

उस अंतराल के बाद दुनिया रुक तो नहीं जाती, कदम थम तो नहीं जाते इंसान के,

उस अंतराल के बाद के जीवन को जीने के लिए, लेकिन कहां भरती है वो खाली जगह

जिसे किन्हीं महत्वपूर्ण क्षणों में जीया है किसी ने, अपने भीतर महसूसती उस कसक को,

कहां भूलता है आदमी एक अंतराल के बाद........