सोमवार, 25 जून 2007
वर्षी पर एतेक धमाल कियेक
लोक खराब कोन-कोन चीज के मानि सकैत छैक तकर ओर-छोर नहि छैक। आब घर या देश स्तर पर देख लिय। कलाम साहब के मोह पर सेहो सवाल उठल आ त्याग पर सेहो। ओ कि करथि तकरा लेल सब पत्रकार लागल छथि। आई त शशिशेखर सेहो भूंकि उठला। काल्हि प्रभाष जोशी के जोश आइल छालैन आई हिनका! आब हमरे उदाहरण ल लिय. काल्हि यानी २४ तारीख के जहिया कि हमर विवाहक दोसर साल पूरा भेल तखन हमर ई कहला सं कि आई हमर दोसर वर्षी छी, लोक सब के हंसी छुटलैक। रूपेश भाई के अम्मी त एकरा सामाजिक संदर्भ में खराब मानलखिन। अस्तु, एहि सं विशेष दुःखी अथवा परेशान भ क हम ई चिट्ठा नहि लिख रहल छी, अपितु ब्लौग के भरि रहल छी।
सोमवार, 18 जून 2007
ब्लौग पर आकर
कमोबेश सभी को ब्लौगीयाते देख हम इस परेशानी मे रहे कि हम क्यों नहीं ब्लौग बना पा रहे हैं। कईयों को कहा कि भाई हमारा ब्लौग बनाने में हमारी मदद करो। लेकिन कोई सुन ही न रहा था। आखिरकार एक ने सूना और हम भी ब्लौग पर आ ही गए। इस बीच सचिन को देखते थे कि लगातार अपने ब्लौग को 'रिच-ऋचा' रहा था, ऐसे में भला हमारी मति पर प्रभाव पड़ना ही था कि हम क्योंकर पीछे रहें। अब जबकि हमारा भी ब्लौग बन ही गया है हम भी कचरा लेखन में सब से टक्कर ले सकेंगे।
तो बहनो और भाईयों, होशियार हो जाओ! हम आ रहे हैं तुम्हारे कंप्यूटर के की-बोर्ड तक, ताकी तुम्हे हिसाब बराबर करने का अफ़सोस न रहे। जितना कमेंट हमने तुम्हारे ब्लौग पर किया है, यदि उतना ही पूरा न हुआ तो समझना कुट्टी, हाँ!
तो बहनो और भाईयों, होशियार हो जाओ! हम आ रहे हैं तुम्हारे कंप्यूटर के की-बोर्ड तक, ताकी तुम्हे हिसाब बराबर करने का अफ़सोस न रहे। जितना कमेंट हमने तुम्हारे ब्लौग पर किया है, यदि उतना ही पूरा न हुआ तो समझना कुट्टी, हाँ!
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