बुधवार, 22 अगस्त 2007

जाहि विधि राखे 'राम...'


पुरानी कहावत है ये. बुजुगॆ गाहे-बगाहे आजमा लिया करते थे. नौजवानों पर अमूमन कम ही असरकारी होता था. है. हां, स्त्रियां जरूर अपवाद रही हैं. उन्हें कहावत से गुरेज तो नहीं होता, अलबत्ता 'रानी झांसी' बनते वक्त वो इससे किनारा कर लिया करती हैं. सिलसिला अनादि काल से चला आ रहा है. मीडिया दफ्तरों में 'राम' की जगह 'दूसरे' नाम ले लिया करते हैं. दिखाऊ माध्यम यानि टीवी में राम की जरूरत संभवतः बड़े मामलों में पड़ती है. रद्दी के लिए ज्यादा उपयुक्त आजकल के अखबारों में हर वरिष्ठ पद पर बैठा शख्स इस 'राम' का 'यूज' कर लिया करता है. कोई खबर ठीक से 'फ्लैश' न हुई तो राम डांटेंगे, तथ्य कम हों तो राम गुस्सा होंगे, ठीक से 'प्रेजेंट' न किया तो राम तुलना करेंगे, और गर छूट गई तब तो समझिए नौकरी जाते-जाते ही बचेगी। अव्वल ये राम न हुए तोप हो गए।
दरअसल, दफ्तरों का माहौल ही ऐसा होता है कि वरिष्ठों के ‌'दिग्दशॆन' को नजरअंदाज करना खतरे से खेलने के माफिक बन जाता है।
एक वे हमारे और हम सबके वरिष्ठ राम से 'दावे' के साथ रोजाना मिलते हैं, मिलते न सही तो बातचीत तो रोजाना हो ही जाती है।
दूसरा, उनके पास 'अ-पार' अनुभव होता है,
तीसरा, वे 'इन-चाजॆ' होते हैं,
चौथा, उनकी रगों में हमसे ज्यादा 'स्वामी-भक्ति' का खून बहता है,
पांचवां, उन तक वो सारी 'चीजें' पहुंचती हैं जिनसे 'आम तबका' महरूम रहता है,
छठा, वे राम की 'इच्छाओं' को भी बखूबी जानते-समझते हैं,
सातवां, उनमें 'विपरीत परिस्थितियों' में भी काम करते रहने और उसका डंका पीटने की अद्भुत क्षमता होती है,
आठवां, वे हमेशा ही गंभीरता का चोला ओढ़े बड़े मिलनसार व्यक्ति होते हैं,
नौवां, उनमें राम-प्रिय होने जैसी खूबियां भी होती हैं,
अंत में दसवां, वे आपके 'जस्ट बॉस' होते हैं।
वरिष्ठों में इससे इतर भी कई खूबियां हो सकती हैं, अलबत्ता होती भी हैं, कही भी जाती हैं। आप मीडियावाले इससे बेहतर कई और खूबियां भी निकाल सकते हैं. स्वतंत्र हैं. इसलिए वरिष्ठों की बात का 'बुरा' नहीं मानना चाहिए. ऐसा लोग कहते हैं. उनकी बात को धेले-भर का भी नहीं मानना चाहिए, ऐसी भी बात नहीं. लेकिन वो कहते हैं न कि 'पगड़ी बची रहे'। इसलिए इतना मत बात-मानू बनिएगा। यह सही है कि राम की विधि से रहने में कोई खतरा नहीं है मगर राम का ही चलते रहने देने से खतरा हो सकता है, अतः थोड़ा संभलकर।

नोट - नौकरी करते रहने और बॉस को पटाकर रखने से यदि राम-कथन का भला होता हो, तो बुराई नहीं, क्यों?

सोमवार, 20 अगस्त 2007

हम क्यों बोलते नहीं...

जीवन में कई ऐसे मौके आते हैं जब हमें बोलना पड़ता है. बोलना शरीर का वैचारिक बोध-प्रदशॆन भी है. पर मामला जब वैचारिक हो तो विचार करना स्वाभाविक है. विचार प्रकट कहां करना है, कहां किया जा सकता है, कैसे किया जाना चाहिए, क्यों किया जाना जरूरी है, इसके क्या प्रभाव पड़ेंगे आदि तथ्यों पर बोलने के पहले सोचा जाना विचार के प्रभाव को निरूपित करता है. हम कई बार अपने वरिष्ठों (तथाकथित ही सही) के सामने सिफॆ इसीलिए वैचारिक रूप से कमतर पड़ जाते हैं कि शायद मेरी बात उन तक सही तरीके से संप्रेषित होगी अथवा नहीं. यह अलग बात है कि वे वरिष्ठ भी सिफॆ इसीलिए हमारी बात को तवज्जो नहीं देना चाहते क्योंकि उन्हें लगता है कि उनकी अरसे से चली आ रही भ्रमात्मक विचारधारा कायम रहे. दुनिया की कई आसान सी समस्याएं इसी कारणवश समाधान के साहिल तक पहुंचने से अब तक वंचित हैं. हां यह जरूर है कि इन समस्याओं के समाधान को ढूंढ़ने की कवायद, निरी भी कहलें, लगातार जारी रहती हैं.
बोलने का इतिहास विश्वभर में और खासकर भारत में समृद्ध है. बतरस की कला हमारी देसज संस्कृति का अभिन्न हिस्सा हुआ करती थी, और है. फिर भी हम बात-चीत में कमजोर पड़ते हैं. क्यों, यह संभवतः कठिन प्रश्न है. और तो और आपके लिए यह सोचना भी मुश्किलात खड़ी कर सकता है कि बातों से जीतना हम जैसों के लिए मुहावरा सरीखा है. इतने पर भी बोलने में हम कमजोर सिद्ध होते हैं, इसकी पड़ताल जरूरी है. करें क्या..., अजी छोड़िए, पड़ताल कर हम क्योंकर अपनी आफत मोल लें. वे वरिष्ठ हैं, वे सोच लेंगे. हा...हा...हा...

सोमवार, 13 अगस्त 2007

इन भक्तों की बलिहारी




सावन की फुहार जीवन में आनंद लाती है। ऐसा कविगण कह गए हैं. अब कह गए तो कह गए. इससे भला कांवड़ियों का क्या. उन्हें तो शिवरस में भीगना है, भीगेंगे. लोगों पर आफत आए तो आए, अपनी बला से.ऐसा मानस शिवभक्त कांवड़ियों के लिए बनना सावन के शुरुआती दिनों के दौरान पश्चिमी उत्तर प्रदेश के इलाकों में हर साल बनता है. सोचिए यदि आपको भी दो घंटे की यात्रा चार घंटे में पूरी करनी पड़े तो, खटारा सी बसों में ऊंघते और मुंह से लार चुआते यात्रियों के साथ सहयात्रा का सुख लेना पड़े, बीच-बीच में अकस्मात ही बम-भोले या हर-हर महादेव का विचित्र तरीके का आलाप सुनना पड़े, या फिर नालियों में बजबजाते कीड़े-मकोड़ों की तरह बस अड्डों पर लोगों को दोने और पत्तलों में जूठनों की तरह पकौड़े खाते देखना पड़े तो जाहिर है इन सबकी जड़ में मौजूद शिवलिंगाभिलाषी कांवड़ियों को आप ...नमन... तो करेंगे ही. हां, ये लिहाज जरूर करेंगे कि सामूहिक तौर पर उन्हें या उनकी दयनीय दशा देखकर थोड़ा रुकेंगे और कुछ बोलेंगे नहीं. कांवड़ियों की दशा दयनीय इसलिए कि एक तो ...बेचारे... जल भरकर इत्ती दूर से उन्हीं के लिए खुली और फैली सड़क पर लाते हैं, तिस पर से पैर में उग आए फफोलों से कराहते रहते हैं. तनिक रुकिए, इस स्थिति में आपके लिए (यदि आप कारटूनिस्ट भी हों तो) कांवड़ियों से उत्पन्न हास्य का बोध करा दूं. होता ये है कि कांवड़िए जाते तो समूह में हैं. यानि गाड़ियों में भरकर. मगर वहां से आते वक्त शिव की भक्ति से इतना उद्वेलित या कह लें उत्प्रेरित हो जाते हैं कि इनकी गाड़ियां इनके पीछे चलती हैं और ये बड़े ...मजे... में आगे-आगे जल उठाए चलते रहते हैं. यहां हास्य बोध उत्पन्न करने के पीछे मेरा तकॆ भले एक कारटूनिस्ट को मैटर उपलब्ध कराना रहा हो, लेकिन जानकारी यह है कि ऐसे कई पढ़े-लिखे कांवड़िए आपको यूं ही मिल जाएंगे. अब ये गुत्थी तो मेरे समझने से बाहर है कि बाबा भोलेनाथ के द्वार तक गाड़ी से चढ़कर जाने में ज्यादा भक्ति होती है या वहां से लौटकर आने में. वैसे गाड़ी से चढ़कर जाने की इच्छा यदि मेरे जैसों से पूछी जाए तो अपने घर यानि वह गांव जहां का मैं दरअसल हूं, वहां जाना ठीक रहता है. इससे एक तो झांकी अच्छी बनती है, दूसरा मां-बाप को भी लगता है कि बेटा अब काम का हो गया है. खैर, ये कांवड़िये अपने फफोलों से कराहते हैं और इनसे आच्छादित पूरा इलाका इनकी भक्ति से. बसें बंद रहती हैं, ट्रेनों में जगह नहीं रहती, जगह-जगह पुलिस बैरिकैडिंग से घिरे इलाके दिखते हैं... रहते हैं तो बस ये कांवड़िए और ये कांवड़िए. हमारे रविनदर भइया का कहना है कि सब प्रशासन की चूतियैय है. ये चाहे तो कभी राजमागॆ (दिल्ली-देहरादून राष्ट्रीय राजमागॆ) बंद न हो.
हम दो-तीन दिन तक जब तक कि कांवड़िया जनित महिमा उनके श्रीमुख से सुनते रहे. जब से होश संभाला है देखते रहे हैं कि घर के बड़े लोग बड़े ही चाव और भक्ति से बाबाधाम जाने के लिए कमर कसा करते थे. ऐसे में बाबा के प्रति भक्ति यहां कम होगी, यह क्यों मान लेते. जो दिक्कत है उसे सहना धमॆ की दृष्टि से जायज समझकर अखबारों में सर धुन लिया करते थे. इसलिए रविनदर भइया के तकॆ से लगता था कि ये भी हमारी ही तरह ...नास्तिक... हो गए हैं इसलिए ऐसी बहकी-बहकी बातें करते हैं. लेकिन भइया कहते हैं न कि मुसीबत अपने सर पड़ती है तभी समझ में आता है. तो हमारी समझ में एक दिन आ गया कि क्यों रविनदर भइया परेशान रहते हैं. उस दिन बसें कम थीं, हम स्टैंड में कान से मोबाइल का फुंतरू सटाए गाना सुन रहे थे, पेपर वाला पेपर बांच रहा था, बेच रहा था, छोले-कुल्चे की दुकानों पर लोग आ-जा रहे, खा-जा रहे थे, स्टैंड का इंचाजॆ चिल्ला-चोट मचाए था, पुलिसवाले एक के बाद एक धड़ाधड़ लोगों का चेकिंग किए जा रहे थे, दूसरे राज्यों की बसें शान से चली जा रही थीं, लेकिन मेरठ जाने वाली बसें भर नहीं आ रही थीं. हमारा मेरठ आना जरूरी था, रविनदर भइया को धमॆसंकट से उबारना था. लेकिन धन्य हो कांवड़ियों की जिनके कारण बसों की सेवा एक तो कम ऊपर से बाधित थीं. हमारी समझ में आ गया कि क्यों रविनदर भइया प्रशासन को कोसते हैं. तुरंत शपथ लिए कि अब हम भी उन्हीं के ग्रुप में रहेंगे और कांवड़ियों को गरियाएंगे. गुस्सा इतना आ रहा था कि पास पड़ी मक्खी को हमने लगभग रौंद ही दिया था, लेकिन वह उड़ गई. हम अफसोस करते रहे. पूरे दो घंटे बाद बस मिली और उसके पांवदान पर सीट. जैसे-तैसे मेरठ आ गए. दिल्ली में जो तरंग उठी थी कि इनके खिलाफ आवाज बुलंद करेंगे, यहां आकर थकान और हिंदू होते हुए ब्राह्मण कुल में जन्म लेने के कारण ज्वार-भाटा बनने से पूवॆ दब गई. दबे-कुचले स्वरूप में अब आप लोगों तक पहुंचेगी. अब आप लोगों को दबे-कुचलों की आवाज उठाने की आदत तो है ही, उठाइएगा. समय तो बीत चुका है. कोई बात नहीं अगले साल......

शुक्रवार, 27 जुलाई 2007

प्रोफेसर कलाम को एक पत्र


आदरणीय कलाम साहब
आप राष्ट्रपति पद से आजाद हो गए हैं। बहुत खुशी की बात है। कम से कम अब आप देश को और भी ज्यादा सुलभ हो सकेंगे। हमने भी इसलिए अभी आपको संपकॆ किया कि हमसे मुखातिब होने में राष्ट्रपति का अति व्यस्त वक्त अब आड़े नहीं आएगा। पूरे पांच साल आप मीडिया में छाए रहे और आप देश के अब तक के सबसे लोकप्रिय राष्ट्रपतियों में रहे। मगर राष्ट्र के प्रति और यहां की जनता के प्रति आपने दायित्व निवॆहन में दो मौकों पर कमजोरी दिखाई। पहली बार उस वक्त जब लाभ के पद को आपने स्वीक्रति दी। राष्ट्रपति की शक्तियां सीमित हैं मगर जिस तरह संविधान और कानून में मौजूद लूप-होल्स का फायदा देश को नुकसान पहुंचाने की दिशा में और अपने फायदे के लिए नेता, कानूनविग्य, अपराधी उठा लेते हैं... यह बहुत जरूरी था कि संविधान में छुपे राष्ट्रपति की शक्ति (पॉकेट-वीटो) का आप प्रयोग देश हित में करते, पूरा देश आपका क्रतग्य रहता। आपके पास तो सुप्रीम कोटॆ और तमाम संविधानविद इस मुद्दे पर सलाह देने के लिए उपलब्ध थे, आपने लिया भी होगा। परंतु निश्चित रूप से विवाद में फंसने और राष्ट्रपति के कतॆव्यों को घोर राजनीतिक-प्रक्रति (पोलिटिसाइज्ड) से बचाने को आपने इस दिशा में आधे रास्ते पर ही अपना कदम रोक लिया। आखिर में फिर आपने राजनीति करने से परहेज किया और राष्ट्रपति चुनाव से पीछे हट गए। आपके उस वक्त दिए गए बयान से साफ जाहिर हो रहा था कि राजनीति का कमॆ स्वच्छ तो नहीं ही है, आपको ये आशंका भी थी कि राजनीति में यदि आप डूबे तो आप विवादित हो जाएंगे और राजनीति करना एक गंदी नीति मानी जाएगी। विडंबना है कि देश के राष्ट्रपति का बयान यह संदेश देता प्रतीत होता है कि राजनीति साफ शब्दों में अच्छे लोगों का कमॆ नहीं, और न यह आसान है। देश की राजनैतिक व्यवस्था राजनीति से ही संचालित हो रही है। देश का वास्तविक नेता प्रधानमंत्री प्रत्यक्ष तौर पर राजनीति से ही इस पद पर पहुंचता है और देश के अंदर व पूरे अंतरराष्ट्रीय मंच पर राजनीतिक कौशल उसे दिखानी पड़ती है। देश का सांविधानिक प्रमुख राष्ट्रपति भी अप्रत्यक्ष तौर पर राजनीति से ही चुना जाता है, इस बार तो पूरे चुनाव के दौरान यह प्रत्यक्ष भी दिखा। ऐसे में जब देश को आप जैसा काबिल राष्ट्रपति नसीब हो सकता था आपने राजनीति से बचाव में ऐसा न होने देने का अपराध किया। कौटिल्य से लेकर चोम्स्की, लास्की और गांधी तक ने राजनीति से परहेज नहीं किया और परंपराओं से लेकर आज तक अपने देश या विश्व में कहीं भी शासन व्यवस्था बिना राजनीति के मुमकिन नहीं। राजनीति को गलत लोगों ने अपने फायदे के लिए इसे गंदी नीति के रूप में कुख्यात कर डाला है, पर रियाया के लिए आप जैसे प्रमुख को राजनीति तो करनी ही चाहिए।

सोमवार, 23 जुलाई 2007

कश्चितकांता विरहगुरुणा...

महाकवि कालिदास रो रहे हैं । ताज्जुब नहीं हो रहा, क्योंकि मात्र अपनी लेखनी से मेघ को प्रेमिका के लिए संदेशवाहक बना देने वाले इस महान भारतीय मनीषी से आषाढ़ का यह सूखा महीना देखा नहीं जा रहा है । आश्चयॆ भी हो रहा है कालिदास को कि क्यों इस तरह की शैतानी पर उतर आया है मेघ । विरह को कागज पर उतारकर तड़प की नई श्रेष्ठता तक पहुंचाने की कालिदास की यह गाथा मेघ की अठखेलियों से अठखेली ही है जिसने न जाने कितने प्रेमियों को विरह-वेदना में तड़पने का आनंद दिया है । फिर भला जब मेघ ही न हो तो कैसी तड़प और कैसा विरह। सब अधूरे से ही तो दिखेंगे ।
पिछले एक महीने से बारिश की उम्मीद लगाए बैठे लोग-बाग खेतों में दम तोड़ती फसलों को देखकर हतप्रभ हैं । एक-दूसरे से पूछते हैं, बारिश के आसार हैं भई ? फिर प्रश्न के साथ जवाब के लिए जूझने में लग जाते हैं । दिन भर में जब कभी-कभार आसमान में बादल दिख भी जाते हैं तो उनकी सूरत रोनी ही होती है । फिर किसान तो किसान हैं बादलों की शैतानी देखने की उन्हें आदत है । लेकिन प्रेमी क्या करें ? उन्हें तो बादलों की जरूरत है भी और नहीं भी । मन की तरंग को उल्लास के साथ बहने देने के लिए बादल चाहिए, बाग में एक-दूजे से आराम से मिल सकें इसके लिए आसमान खुला होना भी जरूरी है । फिर जब ये बादल बरसे भी न तो बाग कहां से हरियाली पाए और प्रेमी किस झाड़ी को ओट बनाएं । और तो और खल-नायकों का डर भी तो बना होता है जो गाहे-बगाहे उन पर नजर रखे होते हैं । बारिश उन्हीं खल-नायकों से बचाती है इन प्रेमियों को । अव्वल एक तो ये खल-नायक बारिश की बूंदों को सह नहीं पाते, दूसरा प्रेमियों की मनोदशा से इनका सरोकार नहीं होता, फिर बारिश की बूंदों का क्या मतलब। तब बताएं कि विरह की मनोदशा में पड़े प्रेमियों के लिए बादलों ने अति कर रखी है या नहीं । कालिदास शायद इसीलिए रो रहे हैं ।

बुधवार, 18 जुलाई 2007

जीनियसों का जिक्र

यूं तो जीनियस कई हो सकते हैं मगर उनमें विरले एकाध ही दिखते हैं। हाल में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में एक जीनियस 'राजेश' हो गया। कहा गया कि वो किसी अमेरिकी वैज्ञानिक 'वालेस रिगार्ट' का 'ताजा संस्करण' है। तथ्य भी ऐसे थे कि एकबारगी तो कोई भी इसे अप्रत्याशित घटना के बतौर लेने से हिचकिचा नहीं सकता था। कहा गया कि संभवतः वो 'मार्स और वेलोसिटी' के आधार पर कुछ अभिनव प्रयोग करने वाला है। अव्वल उसके द्वारा पिछले दो-तीन महीनों में कुछ किताबें भी लिखी गयी बतायी गयीं। अब सारा खेल जब ख़बरों का हो तो रिपोर्टरों के कान तो खडे होने ही थे। आजकल तो चैनलों की मारामारी है तो चैनल वालों ने भी उस जीनियस कि ओर अपने कैमरे घुमा डाले। जब चैनल पर बात फैली तो सारा देश 'प्रिन्स' के बाद जैसे फिर से जग गया। राजेश का अमेरिकन शैली में इंग्लिश बोलना, उसकी अदाएँ, हाव-भाव सभी चैनलों की कसौटी पर परखे जाने लगे। एक चैनल ने कई घंटों की मशक्कत के बाद अंततः ये साबित कर दिया कि हो न हो अमेरिकन वैज्ञानिक कि 'आत्मा' राजेश में घुस ही गयी है। दूसरों को इतने पर ही चैन कहॉ आने वाला था। ख़ुर्द-बीन से खोज-बीन शुरू हो गयी। आश्चर्यजनक रूप से दूसरे ही दिन खबर आ गयी कि राजेश अमेरिकन वैज्ञानिक नहीं महज उसका ढोंग रचने वाला फ़रेबी है। उसे उसके कुछ शिक्षकों ने मिलकर इस लायक बनाया है कि वह यह ढोंग 'खुलेआम' कर सका है। खबर का जो हश्र होने वाला था वह हो गया। खबर फैल भी गयी थी और लोगों ने उसपर अपनी रोटी सेकने कि फोर्मली शुरुआत भी कर ली थी। दौर-ए-सफ़ाई शुरू ये होना था कि राजेश को जीनियस ही रखा एक, अख़बार ढोंगी करार दिए जाने को झुठलाया जाय। खबर को सवॆप्रथम छापने वाले अखबार ने खबर दी कि चैनल वाले राजेश के साथ अन्याय कर रहे हैं। कुछ चैनलों को ये पच नहीं रहा है कि कोई दूसरा चैनल उनसे बाजी मार जाए। इसलिए राजेश को तीन दिनों से बिठाकर उससे सवाल-जवाब कर रहे हैं। खबर छपी, अगले दो दिनों तक खूब हंगामा रहा, लेकिन बात फिर वहीं की होकर रह गई। यानि खबरें जहां से आती हैं, जिसके लिए छपती हैं, जिसके हित में होती हैं, उसे बीच मंझधार छोड़ माझी चला जाता है। इन सारी बातों के इतर राजेश जिस अमेरिकी वैज्ञानिक का क्लोन बन रहा था, उसका नाम-पता दो-तीन लोगों को इंटरनेट पर ढूंढ़े नहीं मिला। इससे ये अफवाह भी फैली कि शायद खबर देने वाला सही था, खबर नहीं। बहरहाल, राजेश का प्रकरण उसके तीन खैर-ख्वाहों पर अपहरण के मुकदमे के साथ थम सा गया। अब बेसब्री इस बात की लगी है कि कब राजेश फिर से अमेरिकी वैज्ञानिक बनेगा।

मंगलवार, 10 जुलाई 2007

चन्द्रशेखर का यूं जाना किसी को दुःखी कर देगा। हालांकि वे अर्से से कैंसर से पीड़ित थे इसलिये इस क्षणभंगुर संसार से उनका जाना उनके ही हित में था। फिर भी एक धाकड़ राजनितिज्ञ के निधन से दुःख तो होता ही है।
चंद्रशेखर कि याद मस्तिष्क को उस दौर-ए-ज़माने में ले जाती है जब हम उन्हें 'भोंड्सी के संत' के रूप में जानते थे। 'माया' उन्हें भोंड्सी का संत कहा करती थी और तिवारी जी (नारायण दत्त तिवारी) को 'नई दिल्ली तिवारी'। हम हंसा करते थे और 'इस' राजनेता कि बचपने जैसी खिल्लियाँ उड़ाया करते थे। हम तीन भाइयों को ये पता नहीं होता था कि इसके चले जाने से हमारा ऐसा नुकसान हो जाएगा। फिर वो दिन भी आया जब भोंड्सी बाबा को बडे राजनेता के रूप में हमने जाना। कालांतर में यह जान लिया कि हरियाणा कि वो जगह जहाँ 'बाबा' ने आश्रम बनाया वो भोंड्सी थी। कल जब डेस्क पर उस भोंड्सी में बाबा की लगायी हरियाली को अरावली कि पहाड़ियों में लहलहाते देखा तो अनायास ही उनके कराए कार्य से श्रद्धा उमड़ आयी।
एक बार की और याद आयी। हम सभी लोग पश्चिमी चम्पारण के लौडिया में थे। चंद्रशेखर अपनी भारत यात्रा के दौरान वहाँ आने वाले थे। बाबूजी तीनों भाइयों को लेकर बडे सवेरे से सभा स्थल पर पहुँचने कि जद्दोजहद कर रहे थे। हमें ये समझ नहीं आ रहा था कि आख़िर भरी धूप में वहाँ हम तीनों का क्या काम? बाबूजी थे कि उस 'पदयात्री' कि खूबियां बताये चले जा रहे थे। खैर हम पहुंच गए। बाद में पदयात्री का भाषण जो सुना 'धन्य' हो गए। समय बीता। पदयात्री हमारे जीवन में सम्मानित के तौर पर उभरा।
उसी सम्मानित का यूं चले जाना अखर गया। अखबारों ने विला-शक बेहतरीन कवरेज किया। टीवी पर शुरुआती दौर में कम खबरें (मुख्य समाचारों में निचले क्रम में आने पर) आयीं। इस पर ग़ुस्सा भी आया। ऑफिस में सम्पादकीय प्रभारी से थोड़ी पैरवी के बाद पूरा पेज दिलवाने कि ख़ुशी आत्मा को सुकून दे गयी। लेकिन चंद्रशेखर का क्या करें वो तो चले गए।