अमवा के डाल पर, कुहके है कोयली
फगुआ त आ गेल सजन काहे न अयली
अंखिया सुखायल, हम निंदिया गंवायल
अहांके न जनली हमर बिंदिया हेरायल।
तन से हमर अंचरा गिरैत हय
सखि बरजोरी हमरा रंगैत हय
केकरा से कहू, कि हम सुनाऊ
दुइए दिन बाकी हवे, जल्दी से आऊ।
के देखे गाल, के देखे कमरिया
अंग-अंग के रंगलक ननदिया
देवरो हमर पाछे न रहइय
मुहल्ला बुला के हमरा रंगइय।
आयब जखनी अहां दुखवा हम कहब
मनवा अहीं पर कइसे हम सूतब
पलंग न गद्दी, न तोसक सुहाइय
होली में सैयां हमर मन हहराइय।
चिट्ठियो के पन्ना भरल जाइत हय
रतिया के सिसकी सब क्यो सुनैत हय
देखब इहो फगुआ न बीत जाय
अहांके दुल्हिन, दुल्हिने रह जाय।
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1 टिप्पणी:
ravish ji ke karan aap ke blog tak pahunch, padha achha laga.......
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