अमवा के डाल पर, कुहके है कोयली
फगुआ त आ गेल सजन काहे न अयली
अंखिया सुखायल, हम निंदिया गंवायल
अहांके न जनली हमर बिंदिया हेरायल।
तन से हमर अंचरा गिरैत हय
सखि बरजोरी हमरा रंगैत हय
केकरा से कहू, कि हम सुनाऊ
दुइए दिन बाकी हवे, जल्दी से आऊ।
के देखे गाल, के देखे कमरिया
अंग-अंग के रंगलक ननदिया
देवरो हमर पाछे न रहइय
मुहल्ला बुला के हमरा रंगइय।
आयब जखनी अहां दुखवा हम कहब
मनवा अहीं पर कइसे हम सूतब
पलंग न गद्दी, न तोसक सुहाइय
होली में सैयां हमर मन हहराइय।
चिट्ठियो के पन्ना भरल जाइत हय
रतिया के सिसकी सब क्यो सुनैत हय
देखब इहो फगुआ न बीत जाय
अहांके दुल्हिन, दुल्हिने रह जाय।
शनिवार, 7 मार्च 2009
पाश की दो कविताएं
संसद
जहरीली शहद की मक्खी की ओर उंगली न करें
जिसे आप छत्ता समझते हैं
वहां जनता के प्रतिनिधि बसते हैं।
-----------------------
उम्र
आदमी का भी कोई जीना है
अपनी उम्र कव्वे या सांप को बख्शीश में दे दो।
जहरीली शहद की मक्खी की ओर उंगली न करें
जिसे आप छत्ता समझते हैं
वहां जनता के प्रतिनिधि बसते हैं।
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उम्र
आदमी का भी कोई जीना है
अपनी उम्र कव्वे या सांप को बख्शीश में दे दो।
शुक्रवार, 6 मार्च 2009
जय हो को तो छोड़ देते

बहुत से लोग राजनीति को गंदा कहते हैं. होगी शायद... पर मैं व्यक्तिगत रूप से सहमत नहीं। हालांकि अभी मैं इस बात पर बहस करने नहीं आया हूं। अभी तो जय हो। कांग्रेस पार्टी ने इस आठ आस्कर पुरस्कार विजेता फिल्म के इस प्रसिद्ध गाने का कापीराइट खरीद लिया है। अब हो सकता है कि राहुल गांधी अमेठी में आजा-आजा जिंदे शामियाने के तले... गाते नजर आएं या फिर उनकी बहन प्रियंका रायबरेली में अपनी अम्मा की सीट बचाने को लोगों को स्लमडागों को नीले-नीले आसमां के तले... इकट्ठी करती दिखें। बहरहाल नुकसान जय हो... का होगा. गुलजार का होगा। अपने रुहानी रचयिता एआर रहमान का या साउंड इंजीनियर रेसुल पूकुट्टी का। क्योंकि इन लोगों ने इस एक फिल्म के इस एक गाने को बनाया और प्रसिद्ध किया. और कांग्रेस ने इन लोगों का बना-बनाया माल एक झटके में गटक लिया. मानो, दूध सारा आपका, मलाई मेरा.
ऐसा नहीं है कि कांग्रेस के पास इस गाने के अलावा चुनाव में लगाने को नारे नहीं थे। कांग्रेस ने ही पहली बार देश से गरीबी हटाई थी, सांप्रदायिकता का सत्यानाश किया और न जाने क्या-क्या। लेकिन इस बार जय हो खरीदकर कांग्रेस ने अपनी 'क्रिएटीविटी' पर लगाम लगा दिया. ये भी हो सकता है कि अपने चुनाव प्रबंधकों को शायद मंदी का डर दिखाने के लिए गीदड़ भभकी दी हो, कि देखो अच्छे नारे बनाओ वरना तुम्हारा नाड़ा खोल देंगे।
मुझे रंज इस बात का नहीं है कि जय हो... बिक गया। खेद इस बात का है इस लोकसभा चुनाव के बहाने अब वह कितनी बार कितने लोगों के हाथ बिकेगी। भले ही भारतीय लोकतंत्र में चुनाव सबसे बड़ा महापर्व हो लेकिन इतना तो सब जानते हैं कि इस दौरान राजनीतिक दलों द्वारा अपनाई जाने वाली प्रक्रियाएं कुछ हद तक तो घिनौनी होती ही हैं. यदि अपराधी किस्म के प्रत्याशी जय हो का नारा लगाएंगे तो पखवाड़ेभर पहले तक फिल्म (आधी ब्रिटिश-आधी भारतीय) को लेकर इतरा रहे हम लोगों का सिर शर्म से झुक नहीं जाएगा? क्या अपने कर्मों को लेकर जनता के बीच प्रदूषित छवि बना चुके लोकसभा उम्मीदवार इस विश्व प्रसिद्ध गाने को अपने ही जैसा प्रदूषित नहीं कर देंगे? डर इसी बात का है. कांग्रेस ने यही किया है. जन-सामान्य के गीत को अपने जनों के लिए सामान्य कर दिया है. इस गाने के गीतकार गुलजार का विरोध इसीलिए जायज है. हमें उनके विरोध का समर्थन करना चाहिए. क्योंकि यह कहीं न कहीं हमारी भारतीयता के हालिया बने प्रतीक की छवि को धूमिल करने का प्रयास सरीखा दिखता है.
मंगलवार, 10 फ़रवरी 2009
दो दृश्य
सीन 1
श्रीलंका की राजधानी कोलंबो में छक्के पड़ रहे थे और उसी देश की अंतर्राष्ट्रीय सीमा से सटे कुछ इलाके बम-धमाकों की गूंज सह रहे थे। यकीन कीजिए सब कुछ एक ही साथ हो रहा था। पिस रही थी जनता। एक तरफ तो उसे मार्केट का खिलाया-पिलाया क्रिकेट देखना पड़ रहा था तो दूसरी ओर गैर-मार्केट का कहर झेलते हुए धमाके सुनने पड़ रहे थे। मजे की बात ये थी कि एक ही रेडियो पर दोनों ही बातें ट्यून करने वाले समान-भाव से दोनों ही खबरों को जज्ब कर रहे थे। हाय रे आदमी!
सीन 2
मंदिर की घंटी बजाकर लौट रहे एक आदमी ने झोले से कुछ खाद्य पदार्थ नि·ाला और सामने बैठे व्यक्ति के रीते हाथों को भर दिया। व्यक्ति खुश। बच्चों को बुला लिया। पास ही बैठे कुत्ते भी आ गए। आदमी हंसा। बोला - देखो कुत्ते जैसी गति है इंसान की। आदमी घर पहुंचा। पत्नी की झल्लाहट से बचने को सामने के पार्क में चला गया। पत्नी झुंझलाई सी बोली - देख रहे हो चिंटू की अम्मा। मेरी फटकार से बचने के लिए पार्क में जाकर बैठ गए हैं। चिंटू की अम्मा ने पार्क के दूसरे छोर पर नहा रही एक पागल सी भिखारी को झिड़कते हुए पत्नी की तरफ देखकर कहा - सामने से तो हट जा... देख नहीं रही वो बैठे हैं! हाय रे आदमी!
श्रीलंका की राजधानी कोलंबो में छक्के पड़ रहे थे और उसी देश की अंतर्राष्ट्रीय सीमा से सटे कुछ इलाके बम-धमाकों की गूंज सह रहे थे। यकीन कीजिए सब कुछ एक ही साथ हो रहा था। पिस रही थी जनता। एक तरफ तो उसे मार्केट का खिलाया-पिलाया क्रिकेट देखना पड़ रहा था तो दूसरी ओर गैर-मार्केट का कहर झेलते हुए धमाके सुनने पड़ रहे थे। मजे की बात ये थी कि एक ही रेडियो पर दोनों ही बातें ट्यून करने वाले समान-भाव से दोनों ही खबरों को जज्ब कर रहे थे। हाय रे आदमी!
सीन 2
मंदिर की घंटी बजाकर लौट रहे एक आदमी ने झोले से कुछ खाद्य पदार्थ नि·ाला और सामने बैठे व्यक्ति के रीते हाथों को भर दिया। व्यक्ति खुश। बच्चों को बुला लिया। पास ही बैठे कुत्ते भी आ गए। आदमी हंसा। बोला - देखो कुत्ते जैसी गति है इंसान की। आदमी घर पहुंचा। पत्नी की झल्लाहट से बचने को सामने के पार्क में चला गया। पत्नी झुंझलाई सी बोली - देख रहे हो चिंटू की अम्मा। मेरी फटकार से बचने के लिए पार्क में जाकर बैठ गए हैं। चिंटू की अम्मा ने पार्क के दूसरे छोर पर नहा रही एक पागल सी भिखारी को झिड़कते हुए पत्नी की तरफ देखकर कहा - सामने से तो हट जा... देख नहीं रही वो बैठे हैं! हाय रे आदमी!
मंगलवार, 6 जनवरी 2009
मंदी के दौर में
आजकल मंदी चल रही है. भारत और पाकिस्तान युद्ध जैसी बातें कर रहे हैं. अमेरिका अपने नए राष्ट्रपति की प्रतीक्षा कर रहा है. पता नहीं बीच में इजरायल पर उसके पड़ोसी फलस्तीन के आतंकी संगठन हमास ने हमला कर दिया. अब इजरायल भारत तो है नहीं कि पाकिस्तान को बार-बार, और बार, धमकाएगा कि देख ले बेटा, अब नहीं माने तो मारेंगे, हां..., उसने हमास पर हमला बोल दिया. लगे लोग मरने, और दुनिया शोर करने. अमेरिका बोला, अभी मंदी है पहले जरा मैं अपना घर ठीक कर लूं तब तक हमास आतंकी संगठन है. मुस्लिम देशों ने कहा, अमेरिका की बेटी की बदचलनी का सबको पता है, अब वह घर छोड़कर भाग रही है, उसे रोको. पहले से ही पड़ोसी से परेशान भारत भी पाकिस्तान को धमकाने वाले अंदाज में दुनिया के सुर में सुर मिला के कहने लगा, हां हमला ठीक बात नहीं है. मगर इजरायल तो इजरायल ठहरा. उसे कहां किसकी फिक्र. मंदी भी उसके इरादों को डगमगा नहीं पाई. उसने हमला चालू रखा.
मगर मंदी उसे तो बड़े-बड़े देशों, बड़े-बड़े लोगों के साथ लगने की बीमारी है, वह अपने काम में लगी रही. अमेरिकी बैंक डूबते रहे, यूरोप के सपने सीलते रहे, एशिया के कुछ हिस्से भी चूंकि इससे महफूज नहीं रह पाए थे, सो उन्होंने भी मरहम-पट्टी चालू कर दी. इन सबके बीच भारत कहता रहा कि हम मंदी से ज्यादा प्रभावित नहीं हैं, तो यहां के लोगों को भी यही लगा कि मंदी हमें क्या मारेगी. हालांकि इस मंदी का एक ट्रेलर जरूर लोगों ने कुछ माह पहले जेट एयरवेज के कर्मचारियों की छंटनी के रूप में देखा था, लेकिन उससे क्या. यहां जब भगत सिंह को पड़ोसी के घर में पैदा होने की सलाह दी जाती है, तो भला ये क्यों माना जाएगा कि मंदी हमारी कंपनी में भी आएगी. लेकिन मंदी तो मंदी ठहरी. भारत सरकार की कही बातों से भले न आई मगर यहां के कई कंपनी उसे ले आए. तब जाकर लोगों को लगा कि जिस तरह महंगाई बिना कहे आ जाती है उसी तरह मंदी भी बिना कहे आई. बेचारे लोग, मौजूदा गृहमंत्री और एक्स-वित्तमंत्री से आस लगाए बैठे थे कि वे कुछ कर लेंगे. पर एक्स-वित्तमंत्री कौन सी अमेरिकी कंपनी को कब रोक पाए थे कि मंदी को रोकते, सो मंदी दबे पांव आ ही गई.
अब भइया, जब मंदी आ ही गई तो स्वागत करो. क्योंकि हमारा देश भारत है, यहां मेहमां जो हमारा होता है, वो जान से प्यारा होता है. जिस दिन नौकरी छूटे एक्स-वित्तमंत्री से कहना कि वह तुम्हारे गृह मंत्रालय को सुधार दें.......
मगर मंदी उसे तो बड़े-बड़े देशों, बड़े-बड़े लोगों के साथ लगने की बीमारी है, वह अपने काम में लगी रही. अमेरिकी बैंक डूबते रहे, यूरोप के सपने सीलते रहे, एशिया के कुछ हिस्से भी चूंकि इससे महफूज नहीं रह पाए थे, सो उन्होंने भी मरहम-पट्टी चालू कर दी. इन सबके बीच भारत कहता रहा कि हम मंदी से ज्यादा प्रभावित नहीं हैं, तो यहां के लोगों को भी यही लगा कि मंदी हमें क्या मारेगी. हालांकि इस मंदी का एक ट्रेलर जरूर लोगों ने कुछ माह पहले जेट एयरवेज के कर्मचारियों की छंटनी के रूप में देखा था, लेकिन उससे क्या. यहां जब भगत सिंह को पड़ोसी के घर में पैदा होने की सलाह दी जाती है, तो भला ये क्यों माना जाएगा कि मंदी हमारी कंपनी में भी आएगी. लेकिन मंदी तो मंदी ठहरी. भारत सरकार की कही बातों से भले न आई मगर यहां के कई कंपनी उसे ले आए. तब जाकर लोगों को लगा कि जिस तरह महंगाई बिना कहे आ जाती है उसी तरह मंदी भी बिना कहे आई. बेचारे लोग, मौजूदा गृहमंत्री और एक्स-वित्तमंत्री से आस लगाए बैठे थे कि वे कुछ कर लेंगे. पर एक्स-वित्तमंत्री कौन सी अमेरिकी कंपनी को कब रोक पाए थे कि मंदी को रोकते, सो मंदी दबे पांव आ ही गई.
अब भइया, जब मंदी आ ही गई तो स्वागत करो. क्योंकि हमारा देश भारत है, यहां मेहमां जो हमारा होता है, वो जान से प्यारा होता है. जिस दिन नौकरी छूटे एक्स-वित्तमंत्री से कहना कि वह तुम्हारे गृह मंत्रालय को सुधार दें.......
सोमवार, 1 सितंबर 2008
कौन लिखेगा परती परिकथा

फोटो साभारः दैनिक जागरण
बाढ़ और बिहार का सदियों पुराना नाता है. साल दर साल यहां के उत्तरी इलाके की जनता बाढ़ की विभीषिका से त्रस्त होती आ रही है. बाढ़ इस साल भी आई. लेकिन वहां जहां कई सालों से नहीं आई थी. याद करें यह वही जमीन है जहां पर बैठकर रेणु ने परती परिकथा लिखी. रेणु, अरे वही अपने तीसरी कसम वाले. याद आया. मगर कुछ सालों से रेणु की परती सोना देने लगी थी. लोग खुश थे, अमन-चैन से रह रहे थे. मगर अबकी कोसी मैया को बहुत सालों बाद इस परती की याद आई. सो रुपेश भाई ने जब कहा कि अब कौन लिखेगा परती परिकथा, तो एकबारगी रेणु, कोसी और बाढ़ की याद आ गई.
इस बार की बाढ़ थोड़ी अलग है. इसलिए विपदा भी, राहत कार्य भी और निश्चित रूप से सरकार तो अलग है ही. मीडिया भी अलग नजर से देख रहा था. वह तो भला हो एनडीटीवी का. उसकी टीम पहले चली गई. भेड़िया-धसान शैली की हिमायती चैनल-संस्कृति के वाहक बाकी चैनलों को तो पूरे चार दिनों के बाद पता चला कि अरे भाई आंदोलन करने वाले, चारा घोटालावाले, राजनीतिक चर्चा करते रहने वाले बिहार में बाढ़ आ गई. फिर क्या था, पिलना था ही, पिल पड़े. एक से एक हेडिंग, पैकेज, विजुअल्स लेकर पेश हो गए सबके सब. कोई कैमरे के साथ नाव पर खड़ा होकर बोल रहा है तो कोई भूख से 'बिलबिलाते' लोगों के बीच जाकर. अलबत्ता एनडीटीवी अव्वल रहा सो उसने बागडोर थामे रखी. हां इस बीच अखबारों को जरूर बाढ़ की खबरनवीसी की याद थी, सो एकाध को छोड़ बाकी बाढ़ के कवरेज में आगे रहे.
अब इस बीच परती परिकथा की याद किसे आए. रूपेश भाई को आई तो आई. हां बिहार के साहित्यप्रेमियों को जरूर आई होगी. आखिर उन्हें दर्द नहीं होगा तो और किसे होगा. तो भाई लोगों हमें इंतजार है पहले किसे याद आती है परती...... की.
रविवार, 13 अप्रैल 2008
कोइ नहीं पूछता राम के तीनों भाई कब जनमें...
दशकों पहले आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने कवियों की उर्मिला विषयक उदासीनता विषयक निबंध लिखा. आचार्य को उर्मिला याद आई उनके पति और दो देवर नहीं. शायद आपने भी कभी लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न का जन्मदिन नहीं मनाया होगा. आखिर मनाए भी क्यों वे कौन से राम हैं...जो वन जाकर रावण सहित कई राक्षसों को मार आए, शूर्पनखा की नाक कटवा ली, समुन्दर अच्छा-खासा सपाट बह रहा था, रामसेतु बनवाकर भविष्य के लिए विवाद पैदा कर दिया, और तो और सीता की अग्निपरीक्षा लेकर नारी जाति को सदा के लिए संदेह के घेरे में डाल दिया. खैर, अब राम को छोड़ कोई उनके भाइयों का जन्मदिन न मनाए तो इसमें राम का क्या दोष. मर्यादा की बात थोड़े ही है.
रामनवमी की आहट पाकर मेरे मन में ये विचार पनपा सो लिख रहा हूं. लिखने की बात भी है और आज से इसे मुद्दा मैं मानने लगा हूं. दरअसल, क्रौंच पक्षियों का आर्तनाद सुनकर रामायण लिखने वाले वाल्मीकि के नाम पर तो कोई जाति ही सही उनकी जयंती मना लेती है. राम सिर्फ राजपूतों के नहीं रह पाए वरना देखते कि क्या शान से राम की भी जयंती मनाई जाती. लेकिन मुद्दा ये है कि मेरी जानकारी के अनुसार वशिष्ठ मुनि ने राजा दशरथ की तीनों रानियों को एक ही पेड़ का एक ही प्रकृति का फल दिया था खाने को. (जिनको मालूम हो कि पुत्रेष्टि यग्य हुआ था उनसे भी मुझे कोई आपत्ति नहीं). तीनों रानियों ने एक ही दिन बच्चे जने होंगे. हो सकता है कि अलग-अलग समय में ये पुनीत कार्य हुआ हो, मुझे पता नहीं. तब ऐसी क्या आफत आ गई कि सिर्फ राम का ही जन्मदिवस प्रसिद्ध रह सका. बाकी के भाई भी लगता है हर साल हैप्पी बर्थ-डे का सॉंग नहीं गाते होंगे इसलिए पिछड़ गए.
तो विग्यजनों मेरा आपसे अनुरोध है कि यदि किसी को राम के इन बेचारे-से भाइयों का बर्थ-डे इस धरा पर कहीं भी मनाए जाने की कोई जानकारी हो तो मुझे दें. यदि पहले से कोई जन्मदिवस हो तब तो ये जानकारी मुझ तक पहुंचाना और भी जरूरी है. तब तक के लिए राम को उनके .........वीं वर्षगांठ की शुभकामनाएं.
रामनवमी की आहट पाकर मेरे मन में ये विचार पनपा सो लिख रहा हूं. लिखने की बात भी है और आज से इसे मुद्दा मैं मानने लगा हूं. दरअसल, क्रौंच पक्षियों का आर्तनाद सुनकर रामायण लिखने वाले वाल्मीकि के नाम पर तो कोई जाति ही सही उनकी जयंती मना लेती है. राम सिर्फ राजपूतों के नहीं रह पाए वरना देखते कि क्या शान से राम की भी जयंती मनाई जाती. लेकिन मुद्दा ये है कि मेरी जानकारी के अनुसार वशिष्ठ मुनि ने राजा दशरथ की तीनों रानियों को एक ही पेड़ का एक ही प्रकृति का फल दिया था खाने को. (जिनको मालूम हो कि पुत्रेष्टि यग्य हुआ था उनसे भी मुझे कोई आपत्ति नहीं). तीनों रानियों ने एक ही दिन बच्चे जने होंगे. हो सकता है कि अलग-अलग समय में ये पुनीत कार्य हुआ हो, मुझे पता नहीं. तब ऐसी क्या आफत आ गई कि सिर्फ राम का ही जन्मदिवस प्रसिद्ध रह सका. बाकी के भाई भी लगता है हर साल हैप्पी बर्थ-डे का सॉंग नहीं गाते होंगे इसलिए पिछड़ गए.
तो विग्यजनों मेरा आपसे अनुरोध है कि यदि किसी को राम के इन बेचारे-से भाइयों का बर्थ-डे इस धरा पर कहीं भी मनाए जाने की कोई जानकारी हो तो मुझे दें. यदि पहले से कोई जन्मदिवस हो तब तो ये जानकारी मुझ तक पहुंचाना और भी जरूरी है. तब तक के लिए राम को उनके .........वीं वर्षगांठ की शुभकामनाएं.
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सड़क पर चलते रहिए, लोग न आपको देखेंगे न आपसे टकराएंगे. अरे भई फुटपाथ है न. सड़क के दोनों किनारों पर. अलग-अलग. आप टकरा ही नहीं सकते. गाड़ियां...