मंगलवार, 13 अप्रैल 2010

नया शहर, नए लोग, नई जिंदगी

सड़क पर चलते रहिए, लोग न आपको देखेंगे न आपसे टकराएंगे. अरे भई फुटपाथ है न. सड़क के दोनों किनारों पर. अलग-अलग. आप टकरा ही नहीं सकते. गाड़ियां सरॆरॆरॆ से निकल जाएंगी. हॉनॆ ज्यादा नहीं बजातीं. लगता है लंदन बनने की होड़ है. पंजाबी आती है तो ठीक, हिंदी भी दौड़ेगी. और यदि फर्राटे की अंग्रेजी आती है, तब तो समझिए, रेहड़ी वाला भी आपको आसानी से डील करेगा.
वो हमारे रूपेश भाई सही कहते थे. और सब तो ठीक है भई, लेकिन चंडीगढ़ में बिना दस पांच लोगों से बतियाए काम कैसे चलेगा. पहले भी सही लगता था, अब फील कर रहा हूं. हां, बहुत दिनों बाद नाटक से एक बार फिर जुड़ाव हो गया है, बलिहारी है, वरना खुद से ही परेशान इस शहर में लोगों के बीच अनजान बनकर लोगों को रहने की आदत हो गई है.
मैं मन को बहलाने के लिए दो-एक दिन पर अपने एक रिश्तेदार के यहां शहर से सटे मोहाली घूम आता हूं. वहां, दु-टूक मैथिली (मेरी मातृभाषा) हो जाती है. इसका कारण साफ है. ऐसा नहीं है कि मन चंडीगढ़ में नहीं बहल सकता. दरअसल जिन चार मित्रों के साथ मैं रहता हूं, उनमें से एक रिपोर्टर है और दूसरा फोटोग्राफर. दोनों दिन में निकल जाते हैं. एक बच जाते थे. उनका भी ठिकाना बदल गया है. अपन अब अकेले गर्मी की बलैयां लेते रहते हैं.
दरअसल चंडीगढ़ की फितरत हो गई है कि सब कुछ सिस्टेमेटिक ही रहे, दिखे, हो......और बने भी. इसलिए खासकर यूपी और बिहार से आने वाले नॉन सिस्टेमेटिक टाइप के लोगों को शुरुआती दिनों में यहां थोड़ी कोफ्त होती है. ऐसा नहीं है कि यहां भी सब कुछ सिस्टेमेटिक है, यहां के लोग भी भारतवासी ही हैं, लेकिन ढेर सारी सड़कें और गलियां बना देने से थोड़ा रीत-पन हावी हो गया है. हालांकि लगभग दस लाख की आबादी पर आठ लाख की तादाद में दिखने वाली गाड़ियां, इस स्थिति को थोड़ी-बहुत झुठलाती सी दिखती हैं, लेकिन मशीनों की वो औकात कहां जो इंसानों की तरह धक्कापेल कर सकें.
खैर, अभी नया हूं. कुछ दिनों मे सीख जाऊंगा यहां पर भी रहना. अभी तो बहुत दिनों से ब्लॉग पर भड़ास नहीं निकाली थी सो निकाल दी. कोशिश में हूं कि इस शहर को भी वैसा ही बनाकर रहने लगूं, जिनमें कि अब तक रहता आया हूं.

गुरुवार, 18 मार्च 2010

भाइयो, मैं चंडीगढ़ आ गया हूं



दैनिक भास्कर ज्वाइन कर लिया है. अब कुछ दिनों तक इन्हीं की सेवा में लगा रहूंगा. जागरण से मुक्ति पाकर थोड़ा सुकून में हूं. लेकिन भ्रम में मत पड़िएगा कि कम काम कर रहा हूं, हां तीन साल की किच-किच से थोड़ी राहत मिली है. अब चंडी के गढ़ से आपसे मिलता रहूंगा. उम्मीद है कि यहां के क्लीन रहने के दावों के बीच गंदा रहकर भी ब्लॉग पर साफ-सफाई बरतूंगा.

इति

शुक्रवार, 18 सितंबर 2009

थरूर को आप माफ करेंगे ?

शशि थरूर ने हम जैसे पहले कभी विमान में न चढ़े और निकट भविष्य में विमान में चढ़ने वाले लोगों को कैटल क्लास कहा. अपन जैसे वे टुच्चे टाइप के लोग, जो विदेश तो नहीं ही गए हैं, देश में भी कभी विमान यात्रा का सुख नहीं ले पाए हैं, विदेश में सालों तक रहने के बाद यहां आकर झटके से विदेश राज्य मंत्री बन जाने वाले इस शख्स के इस बयान से टनों आहत हो गए हैं। आहत होकर अपन अभी कुछ करते, इतनें में थरूर भाई साहब ने सोनिया मांजी से माफी मांग ली. ये अलग बात है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह शुक्रवार की शाम से ही ये रट लगाने लगे थे कि थरूर के बयान को ज्यादा तूल दिया जा रहा है. अब भला मनमोहन जी क्यों नहीं इस मामले को तूल दिया जाना बताएंगे. वे भी तो पहली बार प्रधानमंत्री बनने के कुछ दिनों बाद इंग्लैंड जाकर बोल आए थे कि .. आप ही (अंग्रेजों ने) ने हमें सभ्यता सिखाई, अंग्रेजी सिखाया, हमने तो सीखा ही नहीं था कि सभ्य बना कैसे जाता है। आपको याद होगा हमारे माननीय प्रधानमंत्री का ये बयान, मैंने इनवरटेड कॉमा में नहीं लिखा.
तो... थरूर इसी कैटेगरी के नेता हैं, जिन्हें उस जहीन जनता को कैटल क्लास कहते देर नहीं लगी जो भारत की आम जनता में अभी भी नहीं गिनी जाती. पता नहीं भारत के गांवों में बसने वाली उस जनता को थरूर क्या कहेंगे जो हवा में उड़ते हवाई जहाज को देखकर भी सिर्फ ट्रेन में ही चढ़कर संतोष कर लेती है। लेकिन थरूर ने तो किसी घाघ राजनीतिज्ञ की तरह माफी मांग ली. सभी तरह की जनताओं से. यह जनता पर है कि वह अपने को किस श्रेणी में मानती है. वह विमान में चढ़ने वाली कैटल क्लास की है, या गांवों में रहने वाली. लेकिन थरूर को माफी मिलेगी.

रविवार, 12 अप्रैल 2009

तुझे अभी कई और विष्णु को जन्म देना है...




हिंदी के मूर्धन्य साहित्यकार विष्णु प्रभाकर नहीं रहे. उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले के मीरापुर में जन्मे इस साहित्य-शिल्पी की याद इस गांव के गली-कूचों में रची-बसी है। ये अलग बात है कि प्रभाकर कब के यहां से चले गए. लेकिन अपनी माटी कब छूटी है किसी से, जो उनसे छूटती. शायद इसीलिए जब कुछ साल पूर्व बीबीसी ने उनका साक्षात्कार प्रसारित किया तो उनकी भाषा ठेठ पश्चिमी यूपी वाली थी. उन्होंने कहा भी कि 'ऐ माटी तुझे अभी कई और विष्णु को जन्म देना है...'

आज के लिए बस इतना ही...... और बस थोड़ा सा ये कि अब और कौन है प्रभाकर के जैसा... हिंदी का पुत्र..........

शनिवार, 7 मार्च 2009

होली पर दुल्हिन की पाती दूल्हे के नाम

अमवा के डाल पर, कुहके है कोयली
फगुआ त आ गेल सजन काहे न अयली
अंखिया सुखायल, हम निंदिया गंवायल
अहांके न जनली हमर बिंदिया हेरायल।

तन से हमर अंचरा गिरैत हय
सखि बरजोरी हमरा रंगैत हय
केकरा से कहू, कि हम सुनाऊ
दुइए दिन बाकी हवे, जल्दी से आऊ।

के देखे गाल, के देखे कमरिया
अंग-अंग के रंगलक ननदिया
देवरो हमर पाछे न रहइय
मुहल्ला बुला के हमरा रंगइय।

आयब जखनी अहां दुखवा हम कहब
मनवा अहीं पर कइसे हम सूतब
पलंग न गद्दी, न तोसक सुहाइय
होली में सैयां हमर मन हहराइय।

चिट्ठियो के पन्ना भरल जाइत हय
रतिया के सिसकी सब क्यो सुनैत हय
देखब इहो फगुआ न बीत जाय
अहांके दुल्हिन, दुल्हिने रह जाय।

पाश की दो कविताएं

संसद
जहरीली शहद की मक्खी की ओर उंगली न करें
जिसे आप छत्ता समझते हैं
वहां जनता के प्रतिनिधि बसते हैं।
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उम्र
आदमी का भी कोई जीना है
अपनी उम्र कव्वे या सांप को बख्शीश में दे दो।

शुक्रवार, 6 मार्च 2009

जय हो को तो छोड़ देते


बहुत से लोग राजनीति को गंदा कहते हैं. होगी शायद... पर मैं व्यक्तिगत रूप से सहमत नहीं। हालांकि अभी मैं इस बात पर बहस करने नहीं आया हूं। अभी तो जय हो। कांग्रेस पार्टी ने इस आठ आस्कर पुरस्कार विजेता फिल्म के इस प्रसिद्ध गाने का कापीराइट खरीद लिया है। अब हो सकता है कि राहुल गांधी अमेठी में आजा-आजा जिंदे शामियाने के तले... गाते नजर आएं या फिर उनकी बहन प्रियंका रायबरेली में अपनी अम्मा की सीट बचाने को लोगों को स्लमडागों को नीले-नीले आसमां के तले... इकट्ठी करती दिखें। बहरहाल नुकसान जय हो... का होगा. गुलजार का होगा। अपने रुहानी रचयिता एआर रहमान का या साउंड इंजीनियर रेसुल पूकुट्टी का। क्योंकि इन लोगों ने इस एक फिल्म के इस एक गाने को बनाया और प्रसिद्ध किया. और कांग्रेस ने इन लोगों का बना-बनाया माल एक झटके में गटक लिया. मानो, दूध सारा आपका, मलाई मेरा.
ऐसा नहीं है कि कांग्रेस के पास इस गाने के अलावा चुनाव में लगाने को नारे नहीं थे। कांग्रेस ने ही पहली बार देश से गरीबी हटाई थी, सांप्रदायिकता का सत्यानाश किया और न जाने क्या-क्या। लेकिन इस बार जय हो खरीदकर कांग्रेस ने अपनी 'क्रिएटीविटी' पर लगाम लगा दिया. ये भी हो सकता है कि अपने चुनाव प्रबंधकों को शायद मंदी का डर दिखाने के लिए गीदड़ भभकी दी हो, कि देखो अच्छे नारे बनाओ वरना तुम्हारा नाड़ा खोल देंगे।
मुझे रंज इस बात का नहीं है कि जय हो... बिक गया। खेद इस बात का है इस लोकसभा चुनाव के बहाने अब वह कितनी बार कितने लोगों के हाथ बिकेगी। भले ही भारतीय लोकतंत्र में चुनाव सबसे बड़ा महापर्व हो लेकिन इतना तो सब जानते हैं कि इस दौरान राजनीतिक दलों द्वारा अपनाई जाने वाली प्रक्रियाएं कुछ हद तक तो घिनौनी होती ही हैं. यदि अपराधी किस्म के प्रत्याशी जय हो का नारा लगाएंगे तो पखवाड़ेभर पहले तक फिल्म (आधी ब्रिटिश-आधी भारतीय) को लेकर इतरा रहे हम लोगों का सिर शर्म से झुक नहीं जाएगा? क्या अपने कर्मों को लेकर जनता के बीच प्रदूषित छवि बना चुके लोकसभा उम्मीदवार इस विश्व प्रसिद्ध गाने को अपने ही जैसा प्रदूषित नहीं कर देंगे? डर इसी बात का है. कांग्रेस ने यही किया है. जन-सामान्य के गीत को अपने जनों के लिए सामान्य कर दिया है. इस गाने के गीतकार गुलजार का विरोध इसीलिए जायज है. हमें उनके विरोध का समर्थन करना चाहिए. क्योंकि यह कहीं न कहीं हमारी भारतीयता के हालिया बने प्रतीक की छवि को धूमिल करने का प्रयास सरीखा दिखता है.