आत्मकथा लिखना मामूली बात नहीं. सब नहीं लिख सकते. गांधीजी ने लिखी. नाम दिया सत्य के साथ मेरे प्रयोग. एक आत्मकथा तसलीमा ने भी लिखी. देश निकाला मिला और दूसरे देश से भी निपटाए जाने के बारे में सोची जाने लगी. हालिया आत्मकथा आडवाणी ने लिखी. सभी अखबारों में जम के छपी. आत्मकथा क्या थी पूरा कच्चा चिठ्ठा था अपने राजनीतिक जीवन का. ये मैं नहीं कहता आडवाणीजी कहते हैं. मगर भारतवासियों का क्या करें जो सत्य के साथ हुए प्रयोग और खंड-खंड में बंटी औरत को पढ़ने के आदी हैं. उन्हें क्या ये आत्मकथा रास आएगी. शायद आए. क्योंकि आडवाणीजी सारथी थे (राम के), और प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हैं भविष्य के. फिर उनकी आत्मकथा में ढेर सारे मसाले होंगे. अखबारों में एडिट होकर छपी उनकी आत्मकथा. जैसे आडवाणीजी जो नहीं कह पाए उनकी उस बात में और सान चढ़ाकर छापे जाने के लिए या पढ़वाए जाने के लिए.
किसी-किसी अखबार में उनकी आत्मकथा के विमोचन का समाचार लीड बनकर छपा. लोग शायद गंभीरता से पढ़ेंगे इस उद्देश्य से. एक मसाला मेरे भी हाथ लगा. झूठ या सच ये तो आत्मकथा पढ़ने के बाद ही पता चलेगा लेकिन कुछ शायद असंपादित रह गया और मेरे आंखों तक पहुंच गया. दरअसल आडवाणीजी ने अपनी आत्मकथा में एक जगह कहा है कि विवादित ढांचा के ध्वस्त होने वाली खबर से उन्हें खुशी हुई थी. उन्होंने आगे लिखा कि चाहे जो भी हो राम मंदिर बनकर रहेगा, यह अकाट्य सत्य है. अब बाबरी मस्जिद विवाद पर जब लिब्राहन साहब टाइम पर टाइम लिए जा रहे हैं, आगामी लोकसभा चुनाव का बिगुल कभी भी बज सकता है, ऐसे में आडवाणीजी की आत्मकथा का प्रकाशित होना सही ही है. मोदी मॉडल के समर्थक भारत को भी तो इसी मॉडल पर ले जाना चाहते हैं. फिर क्यों नहीं उनकी आत्मकथा अभी प्रकाशित हो. राज करने की नीति यही कहती है कि साम, दाम, दंड और भेद, चाहे जैसे हो सत्ता का सुख लो. फिर आडवाणीजी, जो पिछली बार थोड़ा सा चूक गए थे, इस बार क्यों न आत्मकथा लिखें. डर भी है. बुढ़ापा कब साथ छोड़ दे कहा नहीं जा सकता. इस बार तो अटलजी भी नहीं हैं. मत चूको चौहान की उक्ति अभी ही तो काम आएगी. कहना गलत नहीं होगा कि अटलजी इसीलिए भूमिका लिखकर भी आत्मकथा के विमोचन समारोह में नहीं आए.
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